सोमवार, 29 जून 2020

मजदूरी-एक कविता

जो तोड़ता है पतथर
क्या वही मजदूर है? 
या जो घुमाता दिन भर
बाईक सड़को पर
पिज्जा की डिलीवरी के लिए, 
उसको भी मजदूर कहेंगे। 
जो चलाता हो उंगलियों को
कैल्कुलेटर और की. बोर्ड पर,
खपाता हो दिमाग अपना
हिसाब किताब के लिए 
थकान तो उसे भी बहुत होती होगी।
एक लेखक जो
कुछ अच्छा लिखने की चाहत में
दिन भर सोचता है
और रात भर जागता है
जब तक कि कुछ अच्छा
लिख न ले तो उसे
चैन नहीं पड़ता। 
क्या इसे भी मजदूरी कहेंगे? 
या फिर मजदूरी होती है
मिट्टी को खोदना ही।

~नीरज आहुजा
स्वरचित

रविवार, 28 जून 2020

वर्चस्व की चाहत- varchasv ki chahat

तुम्हें मेरे
मंन के तंत्र पर
भरोसा नहीं
तुम चाहती हो
आपातकाल
जहाँ सिर्फ चले
तुम्हारी ही मन मर्जी
तुम्हारा ही वोट
तुम्हारा अधिकार।
तुम्ह पसंद नहीं
मुझे कोई और देखे, छूए
या बात करे
मैं जानता हूँ
तुम चाहती हो मुझपर
वर्चस्व अपना
सदा सदा के लिए। 

नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शनिवार, 27 जून 2020

हाँ वतन आजाद है- han vatan azaad hai

हाँ वतन आजाद है
हाँ वतन आजाद है।।

शीष कटे खेली थी होली
दिए प्राण खाकर गोली
चढ़ गए फांसी दे दी जान
ऐसे वीर बने महान
बलिदानों की धरा पर
हुआ भारत आबाद है
हां वतन आजाद है।। 

यूं ही नहीं आई आजादी
पहन के कुर्ता वस्तु खादी
दिया था नारा देश को
छोड़ दो फिरंगी भेष को
इसलिए हम संजीदा है
इसलिए तो हम शाद है 
हां वतन आजाद है।। 

इस धरती का खेल निराला
दिया फिरंगी देश निकाला
जो भी आया गया जान से
कहते है हम सभी शान से
दुश्मन की छाती पर हमने
हरदम भर दी गाद है
हाँ आज वतन आजाद है।।

नीरज आहुजा 
 स्वरचित 

शुक्रवार, 26 जून 2020

आधे अधूरे रिश्ते- Aadhe adhoore rishte

आधे अधूरे रिश्ते
मत निभाओ।
छोड़ो इन्हें तोड़ो इन्हें
हो जाओ नजरों से दूर
हमेशा हमेशा के लिए 
दर्द देंगी
चटक जाएगी
दिल की मेरुदंड
जब मिलेगा धोखा
होगा अहसास
दर्द का
टूटने का
तब तक हो जाएगी
बहुत देर
फिर न खड़े हो पाओगे
रह जाओगे असहाय
अपंग बनकर
इसलिए कहता हूँ 
जो करो दिल से करो
एक ही तो दिल है
हर किसी पर मत मरो 

गुरुवार, 25 जून 2020

दिल्ली ने भारत ना देखा-dilli ne bharat na dekha

दिल्ली ने भारत ना देखा
अपनी बस सीमाएं देखे
खुदगर्जी में लिपटी रहती
मुफ्त   की   सेवाएं  देखे

राजनीति जो करनी होती
लटके  रहते    सब   मुद्दे
राम मंदिर भी  न  बनता
और लगी रहती   35-A
बीमारी की जड़ ना देखी
जहरीली   हवाएं    देखे
खुदगर्जी में लिपटी रहती
मुफ्त  की   सेवाएं   देखे

जान बची सो लाखो पाए
वो  जमाना   बीत   गया
दे  कुर्बानी  हार  गए सब
बिजली पानी  जीत  गया
लहू बहाया वो ना दिखता
ना  जलती  चिताए  देखे 
खुदगर्जी में लिपटी रहती
मुफ्त   की   सेवाएं   देखे 

~नीरज आहुजा
स्वरचित 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

बुधवार, 24 जून 2020

दल और दिल - dal aur dil me antar


dal aur dil me antar

प्यार और राजनीति दोनों में
यहीं तो फर्क है।
'दल' हार जाएंगे
तो कर लेंगे गठबंधन, 
बना लेंगे सरकारें, 
करेंगे राज। 
मगर जब 'दिल' हारेगा
तो होगा बिखराव, 
टूटेंगे रिश्ते, बहेंगे आँसूं,
होगा असहनीय दर्द। 
'दल' बातों को दिल पर नहीं लेते,
'दिल' लेता है। 
'दल' प्रगतिशील होते है
और 'दिल' रुढ़िवादी
परम्पराओं में बंधा हुआ
एक ढकोसले बाज। 
'दल' और 'दिल' के शब्द में
महीन सा फर्क
दोनों के व्यवहार
और आचरण में
कितना फर्क कर देता है, 
कि दोनों एक दूसरे के
विपरीत नजर आने लगते है।

~नीरज आहुजा 
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित