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शुक्रवार, 21 अगस्त 2020

जिंदगी की रील में -Zindagi ki reel me


"ज़िन्दगी की reel में"

Neeraj kavitavali

ज़िन्दगी की reel में

कोई cut paste की

option नहीं होती।

सब कुछ निरंतर

play होता रहता है।

किसी director को

action और cut कहने की भी

जरूरत नहीं पड़ती।

संवाद भी लिखित नहीं होते।

और retake भी नहीं लिया जाता।

हर shot को perfect

shot मान लिया जाता है।

किरदार भी acting नहीं करते

बल्कि उन्हें जीना पड़ता है

हर परिस्थिति को

अपनी सूझ बूझ और

क्षमता अनुसार। 

जिन्दगी की रील

किसी 70 mm के परदे पर

release नहीं होती।

बल्कि ये तो

किसी theater पर चल रहे

drama की तरह

चलती है live.

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

गुरुवार, 20 अगस्त 2020

मानो मेरी अब - Maano meri ab

 मानो मेरी अब 

दस्तक देते हाथ थके
बोल बोल कर लब
खोलो दिल का दरवाज़ा 
मानो मेरी अब

Neeraj kavitavali

रोज तुम्हारी राहों में
लेकर अपना दिल आता
गीत प्रेम के लिखता था
गीत प्रेम के हूँ गाता
कब तलक सताओगे
मीत बनोगे मेरे कब

खोलो दिल का दरवाज़ा 
मानो मेरी अब

चंदा मेरा यार बन गया 
तारों से हो गई दोस्ती
तुम होती तो अच्छा होता
मिलकर करते मस्ती
चाँद सितारे शबनम 
करते सिफारिश सब

खोलो दिल का दरवाज़ा 
मानो मेरी अब

समय गवाना,पछताना
मानोगे नहीं बात
मैं देता हूँ प्रेम प्रस्ताव
तुम देते आघात 
जानोगे क्या प्रीत मेरी
मर जाऊंगा तब

खोलो दिल का दरवाज़ा 
मानो मेरी अब

पल पल करके कितने ही
गुजर गए दिन साल
कभी तो मुझसे पूछा होता
तुमने मेरा हाल
बुलबुला नहीं पानी का
जो जाता पल में दब

खोलो दिल का दरवाज़ा 
मानो मेरी अब

----------- 

 नीरज आहुजा 

स्वरचित 


बुधवार, 19 अगस्त 2020

सब अच्छा हो जाएगा - sab achchha ho jayega

"सब अच्छा हो जाएगा" 

Neeraj kavitavali

बदलती है रुत,

मौसम और समय भी।

एकरस इस संसार में

क्या रह पाएगा।। 

जो आज है कल नहीं।

जो कल होगा वो परसो नहीं।

वक्त का पहिया घुमेगा और

सब कुछ बीता जाएगा।। 

यही धारणा लिए मन मे

पड़ता है जीना 

भले हो दु:ख कितने भी

हार नहीं मान सकते

रखनी पड़ती है आशा

अच्छा होने की

और कहना पड़ता है

सब अच्छा हो जाएगा ।।

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

मंगलवार, 18 अगस्त 2020

छुपते फिरते हैं - Chhupte firte hai


"छुपते फिरते हैं"

छुपते फिर रहे हैं

अपनी सोच से

द्वंद से, विचारों से। 

भाग जाना चाहते है 

खुद से कहीं दूर,

किसी वीरान जगह पर

जहाँ देख न पाएं

ढूंढ न पाएं खुद को।

Neeraj kavitavali

आँखें बंद कर लेना चाहते है

और दबा देना चाहते है

मन में कौंधते हुए

सवालों को

अंतर्द्वंद को

जैसे दबा दी जाती हैं

बहुत सी खबरें अक्सर 

सनसनी फैलने के डर से

शहर को बचाने के लिए।


बस इसी तरह

मस्तिष्क को भय और

आतंक के माहौल से

बचाने का एक तरीक़ा 

यह भी है कि

होने दिया जाए

जो हो रहा

और उसे ही

अपनी नियती मानकर

ऐसे रहें जैसे कि कुछ 

हुआ ही ना हो।

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

सोमवार, 17 अगस्त 2020

थोड़ी सी हँसी - Thodi si hasi


Neeraj kavitavali

"थोड़ी सी हँसी"

थोड़ी सी हँसी

बचाकर रखना

मेरे लिए

ताकी जब मैं तुमसे मिलूँ

तो तुम्हारे चेहरे पर

मेरे नाम की

एक हल्की सी

मुस्कान सजी हो।


अच्छा लगेगा मुझे

गर तुम ऐसा कर सको।

वैसे कोई उम्मीद नहीं

तुमसे कुछ पाने की

मगर फिर भी

पता नहीं क्यूँ

ख्वाहिश कर बैठता हूँ

जब भी देखता हूँ तुम्हें।

शायद सिर्फ इसलिए

कि मुझे तुमसे

बाते करना

तुम्हारे साथ वक्त बिताना और

तुम्हें यूँ ही कईं घंटो तक

टकटकी लगाकार देखना

अच्छा लगता है।

क्या तुमको भी

अच्छा लगता है

मुझसे बाते करना,

तुम्हारा नाम लेने भर से

मेरे चेहरे पर आने वाली

हल्की सी मुस्कान देखना?

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नीरज आहुजा 

स्वरचित रचना 

शनिवार, 15 अगस्त 2020

चलते चलते राह में - Chalte chalte raah me

Neeraj kavitavali


"चलते चलते राह में"

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चलते चलते राह में

मिल जाते है जब हमें

अपने पुराने

खोए हुए पासवर्ड

तो धड़क उठता दिल

देखकर उनको

आता है तुफान

उफनती है लहरे

और टकराकर साहिल से

कह देना चाहती है

सब कुछ अपने दिल की 

मगर रोक लेते हैं खुद को

गोद में उनकी

एक बरस के छोटे से

किसी और आई डी से

जनरेट हुए

ओ टी पी देखकर।

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

सोमवार, 3 अगस्त 2020

बीत सकल मधुमास गया - Beet sakal madhu maas gya


Neeraj kavitavali


"बीत सकल मधु मास गया" 
लावणी-छंद
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मैं  अकेलाा  बेपरवाह  क्यूँ,  तेरा   भी  तो  हिस्सा है
झांक जरा  तू  देख  गिरेबां, बीत गयाा जो किस्सा है
हर बार दिया  ताना मुझको, जब भी तेरे  पास  गया
बीत गयी अब रैना भुगतो, बीत सकल मधुमास गया
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

रविवार, 2 अगस्त 2020

तरह तरह के हथकंडे - tarah tarah ke hathkande


Neeraj kavitavali

"तरह तरह के हथकंडे" 
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तरह  तरह  के  हथकंडे  जब,  चलते  दुनियादारी में

भेद  नहीं  कर  पाते  हैं फिर, यार  और  अय्यारी  में

रहे भरोसा नहीं  किसी पर, हर  पल  मन संदेह  करे

कौन खड़ा है साथ  सहज हो, कौन खड़ा मक्कारी में

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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

डायरी के पन्ने - Diary ke panne

Diary ke panne

मिला कुछ पुराना सा
अधूरा सा, 
खोले जब डायरी के
कुछ पन्ने तो
जो कि अब कभी
पूरे नहीं हो पाएंगे! 

Neeraj Kavitavali


हम छोड़ देते है
कुछ चीजे यूँ ही अधूरी 

फिर रह जाती है वो
उम्र भर के लिए
मन की टीस बनकर 

जैसे किसी घर दीवार
जिसमें दरारे पड़ने लगें
और उसकी मरम्मत ना हो
तो धीरे धीरे घर किसी
खंडहर मे तब्दील हो जाता है 

ठीक वैसे ही हमारे 
हमारे खयाल
हमारी इच्छाएँ
हमारे रिश्ते भी सब
मरम्मत के अभाव में
तब्दील हो जाते है
किसी न किसी खंडहर में। 
होंसला न करना
हिम्मत हार जाना
छोड़ कर पूराना
आगे की तरफ बढ़ जाना
यही सब करते रहते है
हम उम्र भर। 
_____________
नीरज आहुजा 
स्वरचित 

कौन चाहता सम करना - kon chahta sam karna

Neeraj Kavitavali

"कौन चाहता सम करना"

ऊँची  कर  आवाजें  अपनी, दूजे  की  मद्धम करना
शौर शराबे तले  दबा सच, झूठ जिता परचम करना 
सब  ऐसी  दुनियादारी  में, हार  जीत  में  उलझ गए 
सब  चाहें  वर्चस्व  जमाना, कौन चाहता  सम करना

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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

अधूरा सफ़र - adhoora safar


Neerajkavitavali

"अधूरा सफर"

मैं जानता हूँ,
मैं छोड़ दूंगा
ये सफर भी अधूरा 
और शायद पकड़ लूंगा
 कोई नयी अनजानी राह, 
कोई पगडंडी
या फिर कोई कच्चा रास्ता 
जो कि अचानक से
नजर आ जाता है
पक्की सड़कों पर चलते हुए
नीचे की तरफ।
क्योंकि मैं जानता हूँ
मेरी कोई मंजिल नहीं,
कोई पड़ाव नहीं,
कोई किनारा नहीं
जहांँ बैठकर कुछ पल के लिए
मैं ये सोच सकूँ कि मैंने
क्या पाया और क्या खोया
इस सफर पर चलते हुए। 
मैं तो चलते चलते
छोड़ दूंगा
एक दिन ये सांसे भी
बिना किसी
आखिरी ख्वाहिश के।
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

पहले जैसी बात नहीं - pahle jaisi baat nhi


Neerajkavitavali


"पहले जैसी बात नहीं" 

सूरज उगता ढल जाता है होते अब दिन रात नहीं
समय गुजरता रहता है बस पहले जैसी बात नहीं

छोटी-छोटी खुशियों में जब, जीवन का रस लेते थे
हम बचपन में  बेमतलब की, बातों पर हँस लेते थे
ठूंठ हुए  मन की डालों पर, उगती  कोई पात  नहीं
समय  गुजरता  रहता है बस पहले जैसी बात नहीं

कश्ती अपनी और चली किस, धारा देखा करते थे
कूद पड़े  कीचड़  देखा  ना, गारा   देखा  करते  थे
सावन आते जाते  रहते, होती  अब  बरसात  नहीं
समय गुजरता रहता है बस, पहले जैसी  बात नहीं

बुधवार, 29 जुलाई 2020

ढोल बजने लगे - Dhol bajne lage


Neerajkavitavali

"ढोल बजने लगे"

बिजलियाँ चमकी, गड़ा गड़ ढोल फिर बजने लगे
चाँद  तारे    गीत  गा  सावन   बुला  भजने   लगे 
आसमां   में  बादलों  का  शामियाना  ओढ़   कर
रात   दिन  महफ़िल   सजाते  नाचने  सजने लगे

अपने ही मन की करना - Apne hi man ki karna


Neerajkavitavali


अपने ही मन की करना

सबकी बातें सुन लो लेकिन, अपने ही मन की करना
राह अगर बतलाए कोई, सोच  समझकर पग  धरना 
भला  बुरा  सब अपने  हाथो, में  ही  होता  है सबका
जैसा   कर्म   करे  है  कोई,  पडे़   उसे  वैसा   भरना

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

चा़ँद तारे रात भर chand tare raat bhar


Neerajkavitavali

चाँद तारे रात भर

चाँद  है  चमके, सितारे  टिमटिमाते  रात भर
जागते हैं किसलिए, महफ़िल सजाते रात भर
खिड़कियों  के  जब हटा परदे इन्हें हम देखते
हैं  जमीं  से दूर कितने पर   लुभाते  रात  भर

सोमवार, 27 जुलाई 2020

मयस्सर नहीं होता - mayassar nhi hota


Neerajkavitavali

तेरी अना का
मेरी चाहत के साथ
कभी बसर नहीं होता।।
तू चाँद से ज्यादा
खूबसूरत तो है
लेकिन मुझको
मयस्सर नहीं होता।।
मेरे इश्क़ की सुबह
रात की चौखट पर
दम तोड़ जाती है
और तू है के तुझ पर कोई
असर नहीं होता।।

रविवार, 26 जुलाई 2020

बिगड़ जब भाव जाते - bigad jab bhaav jaate


Neeraj kavitavali

  • बिगड़ जब भाव जाते हैं

उछलते  कूदते  कितना, मगर  कुछ काम ना  आते
चलें  अपने  मुताबिक  ही, बिगड़ जब भाव हैं जाते
कलम करती रहे कोशिश, ग़जल मुक्तक नहीं बनते
उतरते  भाव  ना  मन  से, नहीं  हैं   शे'र   बन  पाते

शनिवार, 25 जुलाई 2020

सबको अपना ग़म प्यारा (Sabko apna gam pyara)


Neeraj kavitavali


" सबको अपना ग़म प्यारा"

सबको अपना ग़म प्यारा है, कौन किसी की कब सुनता

कौन  लगा  घावों  पर  मरहम, दामन   के  कांटे  चुनता

हर  पल  खोये  रहने   की आदत  में  यूँ  मजबूर   हुआ

छोड़ हक़ीक़त को  जीवन  की, ख़्वाब  सुनहरे  है बुनता

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

मंज़िलें इंतज़ार करती हैं - manzile intezar karti hai

neerajkavitavali
मंज़िलें इंतज़ार 
करती  हैं।।
राहगीरों की आह
भरती हैं।। 
कर्म के पथ पर
कोई चलकर आए
तो भर लेती हैं
बांहों में अपनी, 
हाथों की लकीरें
तभी तो इनसे
बहुत डरती हैं।।

नीरज आहुजा 
स्वरचित