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मंगलवार, 7 जून 2022

पत्थर दिल


शीर्षक : पत्थर दिल

~~~❤️~~~❤️~~~❤️~~~

नीरज कवितावली

दोष देना, चिल्लाना

और अलग हो जाना

तुम्हार दु:ख नहीं, 

तुम्हारी प्रवृति है।

तुम बिना स्वार्थ के साथ 

नहीं रह पाते। 

इसिलिये

ना तुम कभी सम्पूर्ण हो पाते हो, 

और ना ही कभी मुझे 

सम्पूर्ण होने का अहसास दे पाते हो।

मन की एकाग्रता को भंग कर 

मन को आकर्षित करते हो

और दूर भाग जाते है।

बाद इसके मन तड़पता है

चोट खाता है और

ठोस हो जाता है। 

फिर दुनिया इसे "पत्थर दिल" 

कह कर बुलाती है।

************

नीरज आहुजा 

यमुनानगर (हरियाणा) 

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ गाड़ियां कभी नहीं रुकती

कुछ गाड़ियां
कभी नहीं रूकती
उन्हें हती है हमेशा
भागने की
दोड़ने की
अपने निर्दिष्ट
स्थान की तरफ
ना तो उन्हें कोई 
पंक्चर की दुकान
नज़र आती है
और न ही ढाबा
कोई स्पीड ब्रेकर भी
उनकी रफ्तार को
कम नहीं कर पाया
कुछ गाड़ियां यूँ ही रहती है
भागती दोड़ती
किसी सराय की परवाह 
किए बगैर
अपने गंतव्य की और
निरंतर ।
~नीरज आहुजा
स्वरचित 

शुक्रवार, 29 मई 2020

सत्य सत्य में अंतर satya satya me antar

कुछ भी सत्य से
बड़ा नहीं।
सत्य अटल है।
मेरे और तुम्हारे
नजरिए में अंतर
सत्य को पलट नहीं सकता।
हम जिसे सत्य कहते है
वो धारणा है
मेरी तुम्हारी
दोनों की अलग अलग।
जो तुम देखना चाहते हो
वो मैं नहीं, और जो मैं
देखना चाहता हूँ
वो तुम नहीं।
हम दोनों में कभी
एकरूपता नहीं आती।
भेद यही है,
समस्या भी यही है
और झगड़ा भी यही।
हम सत्य 
नहीं देखते
अपनी अपनी
जरूरत देखते है,
अपनी इच्छाएं और
अपनी आकांक्षाओं में लिप्त
एक दूसरे पर
आरोप प्रत्यारोप
मढ़ते है।
हम सत्य नही देखते
हम धारणाएं बनाते है और
उन्हें सत्य बोल देते है।
सत्य को सुनने और
देखने के बाद भी
समझने की
आवश्यकता होती है।

~नीरज आहुजा 
स्वरचित रचना