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शनिवार, 18 जुलाई 2020

ताजमहल बनवा दूंगा - Tajmahal Banwa Dunga


Tajmahal Banwa Dunga, Neeraj Kavitavali

एक बार तो कहकर देखो, तुम पर जान लुटा दूंगा

कदम तुम्हारे आसमान के, तारे  तोड़  बिछा  दूंगा

बड़बोले   बनकर  माशूक़ा,  से  वादे माशूक़  करें

गर मेरी  मुमताज़ बनो तुम, ताजमहल बनवा दूंगा 

रविवार, 12 जुलाई 2020

सुख है तो बस इतना है - sukh bas itna hai

दिल की क्या  तस्दीक करें, कैसे जाने  कितना है

दर्द जगह  छोड़े जितनी, सुख है तो बस इतना है

भाव बदल दिल के देखो, दिल तस्वीर बदल देगा

राजी उसमें ही रहना, जिसको मिलता  जितना है

Neeraj Kavitavali

शनिवार, 11 जुलाई 2020

छोड़ हमें जाने वाले - Chhod hme jaane wale

छोड़  हमें  जाने  वाले,  लौट  नहीं  फिर  आते  हैं

घाव नहीं दिल के भरते, जब तक हम सहलाते हैं

कैसे  जाने  मजबूरी, किसकी  क्या  हो सकती है

कौन बताता है दिल की, दिल  में  जो  भी बाते हैं

Neeraj kavitavali

शनिवार, 4 जुलाई 2020

प्यार की ताक़त - pyar ki takat

बह्र: 2122 2122 2122 212

सर झुका   छोटा नहीं  होता कभी, जो  मीत हो

प्यार वो ताक़त कि जिसमें हार कर भी जीत हो

दुश्मनी   टिकती  नहीं   है  सामने  इसके  कभी

चाहतों  को  दे  जगा, कितना  भले  विपरीत हो

Neeraj kavitavali

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ गाड़ियां कभी नहीं रुकती

कुछ गाड़ियां
कभी नहीं रूकती
उन्हें हती है हमेशा
भागने की
दोड़ने की
अपने निर्दिष्ट
स्थान की तरफ
ना तो उन्हें कोई 
पंक्चर की दुकान
नज़र आती है
और न ही ढाबा
कोई स्पीड ब्रेकर भी
उनकी रफ्तार को
कम नहीं कर पाया
कुछ गाड़ियां यूँ ही रहती है
भागती दोड़ती
किसी सराय की परवाह 
किए बगैर
अपने गंतव्य की और
निरंतर ।
~नीरज आहुजा
स्वरचित 

बुधवार, 24 जून 2020

दल और दिल - dal aur dil me antar


dal aur dil me antar

प्यार और राजनीति दोनों में
यहीं तो फर्क है।
'दल' हार जाएंगे
तो कर लेंगे गठबंधन, 
बना लेंगे सरकारें, 
करेंगे राज। 
मगर जब 'दिल' हारेगा
तो होगा बिखराव, 
टूटेंगे रिश्ते, बहेंगे आँसूं,
होगा असहनीय दर्द। 
'दल' बातों को दिल पर नहीं लेते,
'दिल' लेता है। 
'दल' प्रगतिशील होते है
और 'दिल' रुढ़िवादी
परम्पराओं में बंधा हुआ
एक ढकोसले बाज। 
'दल' और 'दिल' के शब्द में
महीन सा फर्क
दोनों के व्यवहार
और आचरण में
कितना फर्क कर देता है, 
कि दोनों एक दूसरे के
विपरीत नजर आने लगते है।

~नीरज आहुजा 
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित 


रविवार, 21 जून 2020

लिखे थे खत तुझे- likhe the khat tujhe

लिखे थे खत तुझे
चरागों तले
अंधेरी रातों में
सोचकर तुझको
कि तुम आ जाओ जो
अचानक से
सामने मेरे
तो मैं क्या कहूँगा। 
क्या मैं सकपका जाऊंगा 
या बोल दूंगा
दिल की सारी बातें
बेधड़क तुमको 
जो भी मैं सोचता हूँ
तुम्हारे बारें में
तन्हाई में बैठकर। 

क्या तुम भी सोचती हो
मेरे बारे में
इस तरह ही
या
मैं ही दीवाना हूँ
आशिक़ हूँ वगैहर वगैहर
जो भी होते है नाम
पागल प्रेमियों के। 

क्या तुम भी हो जाती हो
पागल, दिवानी
और लिखती हो
खत मुझे
इसी तरह ही
अंधेरी रातों में
तन्हाई में बैठकर 
सोचकर मुझको।

~नीरज आहुजा
स्वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 19 जून 2020

हार को जीत में बदलना है- haar ko jeet me badalna hai

कुंदन  बनना  है, जलना है
हार को जीत में बदलना है

हाथ पर  हाथ  धरे क्यों  बैठे
हम मुश्किल से डरे क्यों बैठे
पथ पर जो अवरोध बिछे हो
उनको पाँव तले  कुचलना है

हो जिजीविषा विश्वास अटल
धैर्य बुद्धि में, हो बाहों में बल
विफलता दामन पकड़े अगर
झटक कर  हाथ  निकलना है

हो दूर  भले  तट  जितना  भी
रख धैर्य मन में, बल उतना ही
मझधार ही जीवन  लक्ष्य नहीं
माझी को भंवर से निकलना है

~नीरज आहुजा
सर्वाधिकार सुरक्षित 

शनिवार, 13 जून 2020

गुजर जाओ चुपचाप - chup chaap guzar jao

चुपचाप गुजर जाओ
हलके से होले से
दबे पांव
करीब से मेरे
मुझे पता भी न चले
कि तुम कब आए थे
और कब चले गए।
तुम भी ओढ़ लो
मेरी खुशियों का चोला
और हो जाओ
मेरी खुशियों की तरह
ही मुक्तसर। 
ये कब आती है और
कब चली जाती है
मुझे पता ही नहीं चलता।

महिना मोहब्बत वाला - mahina mohobbat wala

वैलेंटाइन स्पैशल

महीना मोहब्बत वाला।
बने हर कोई दिल वाला।।

बन ठन के निकले हैं घर से।
समझे है, खुद को नन्दलाला।।

सूनी पड़ी है मोहब्बत कि गलिया।
हाथों में लेके फिरे प्रीत का प्याला।।

बन्द कमरा जहां सूरज कि पहुंच नहीं।
इन तमाम अन्धेरा को कहे हैं उजाला।।

~नीरज आहुजा 

स्वरचित 



शुक्रवार, 29 मई 2020

सत्य सत्य में अंतर satya satya me antar

कुछ भी सत्य से
बड़ा नहीं।
सत्य अटल है।
मेरे और तुम्हारे
नजरिए में अंतर
सत्य को पलट नहीं सकता।
हम जिसे सत्य कहते है
वो धारणा है
मेरी तुम्हारी
दोनों की अलग अलग।
जो तुम देखना चाहते हो
वो मैं नहीं, और जो मैं
देखना चाहता हूँ
वो तुम नहीं।
हम दोनों में कभी
एकरूपता नहीं आती।
भेद यही है,
समस्या भी यही है
और झगड़ा भी यही।
हम सत्य 
नहीं देखते
अपनी अपनी
जरूरत देखते है,
अपनी इच्छाएं और
अपनी आकांक्षाओं में लिप्त
एक दूसरे पर
आरोप प्रत्यारोप
मढ़ते है।
हम सत्य नही देखते
हम धारणाएं बनाते है और
उन्हें सत्य बोल देते है।
सत्य को सुनने और
देखने के बाद भी
समझने की
आवश्यकता होती है।

~नीरज आहुजा 
स्वरचित रचना 

रविवार, 17 मई 2020

स्मृतियाँ - memories never change

हाँ, साथ थे हम
कुछ साल पहले। 
मिलते थे रोज
एक दूजे से
हाँ, होता था आभास
प्रेम का। 

अब नहीं मिलते
लेकिन प्रेम फिर भी
वैसा ही है, 
और तुम भी तो
बिल्कुल नहीं बदली
वैसी ही हो
जैसे बिछड़ते समय
देखा था तुम्हे। 
लेकिन मैं बदल रहा हूँ, 
हर-पल, हर-क्षण
बदल रहा हूँ। 

अब पहले की तरह
जल्दी से
शेव नहीं करता, 
हफ्ता हफ्ता भर
यूँ ही बढ़ने देता हूँ
दाढ़ी अपनी। 

पहले आईना देखकर 
इत्मीनान से
बाल संवारता था, 
अब नहीं। 
अब आँखें बंद करता हूँ 
और तुम्हारी यादों को
संवारता हूँ। 

देर तक जागना, 
देर तक सोना, 
संडे हो या मंडे
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। 

न तुम्हारे आने की, 
न तुम्हारे जाने की, 
न तुमसे मिलने की, 
अब किसी बात की
कोई फिक्र नहीं रहती। 

मगर तुम
आज भी वैसी ही हो
जैसे कल थी। 
वैसा ही जैसे तुम्हें
आख़िरी बार देखा था
शाम की दहलीज़ पर
खड़े होकर 
हाथ हिला कर 
मुझे अलविदा कहते हुए।
 

वही दुपट्टा,
वहीं सलवार कमीज, 
वही बिखरी हुई लटो को
बार बार कान के पीछे
ले जाती हुई तुम्हारी तर्जनी, 
और चेहरे पर
पसरी हुई उदासी
सब कुछ याद है मुझे। 

हाँ, सब कुछ वैसा ही है। 
क्योंकि स्मृतियां नहीं बदलती, 
उनकी उम्र नहीं ढलती, 
उनकी आदते, चेहरा
बिल्कुल वैसा ही रहता है
जैसे किसी लम्हे को
कैद कर लिया जाता है
कैमरे से तस्वीरों में, 
और हम देखते है
उम्र के दो पड़ाव एक साथ
एक बदलता हुआ
तो दूसरा 
समय को मात देता हुआ स्थिर। 

आज और बीते हुए
कल के संगम का
जरिया... मात्र ये
स्मृतियाँ ही तो है
जिन्हें हम संजोए रखते है
हमेशा हमेशा के लिये खुद में। 

नीरज आहुजा 
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित