सोमवार, 9 फ़रवरी 2026
निस्वार्थ प्रेम unconditional love
शनिवार, 11 अक्टूबर 2025
हो कोई साथ तो दिल की सुनाऊँ
ग़ज़ल
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मिले कोई जिसे मैं देख पाऊँ।
बुरा उसको लगे ना, जो सताऊँ।
सफ़र अच्छा रहा अब तक मगर यह
हो कोई साथ तो दिल की सुनाऊँ।
बिछड़ जाए अगर मुझसे कभी वो
उसी की याद में आँसू बहाऊँ।
लिखूँ मैं सोचकर उसको कविता
तलब उठने लगे तो गुनगुनाऊँ।
चौबारे से मुझे वो देखती हो
इशारे से उसे नीचे बुलाऊँ।
चमक आए नहीं जब तक ग़ज़ल में
जिगर के चाक सारे छेड़ जाऊँ।
उठाने में लगेगी देर घूंघट
अभी चल चाँद से बादल हटाऊँ।
फिरूँ गलियों में कर आवारगी मैं
कहीं जो देख लूँ उसको चिढ़ाऊँ।
कि जब घर खर्च वाली ही नहीं हो
सडूँ क्यूँ धूप में, जाकर कमाऊँ।
तुझे जो दे सके 'नीरज' सभी हक
उसी मुटियार आगे सर झुकाऊँ।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
सभी एक ही हैं ठिकाने अलग हैं।
ग़ज़ल : सभी एक ही हैं ठिकाने अलग है।
ग़ज़ल
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तिरंगे पकड़ मुँह दिखाने अलग हैं।
मगर बम्ब-बारुद बनाने अलग हैं।१
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अमन चाहने का करें ढोंग जमकर,
लगा आग घर भी जलाने अलग हैं।२
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जिन्हें भौंकना देख कर शाह हरदम,
मिले हड्डियाँ तो दिवाने अलग हैं।३
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ज़हर घोल दिल में ग़ज़ल शे'र कहते,
कि हैं मुँह जितने ज़बाने अलग हैं।४
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कही बात कोई नहीं माननी पर,
सवालात सारे उठाने अलग हैं।५
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कि जो पार सरहद, वही देश अंदर,
सभी एक ही हैं, ठिकाने अलग हैं।६
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
पदान्त-: अलग हैं
तुकान्त -: दिखाने, बनाने, जलाने, दिवाने, ज़बाने, उठाने, बहाने, मुहाने
नज़ारों से ग़ज़ल होती।
शीर्षक : नज़ारो से ग़ज़ल होती।
तुम्हारे नक्श, चेहरे औ इशारों से ग़ज़ल होती।
कि ऐसे ही हसीं दिलकश नजारों से ग़ज़ल होती।१
सुरुरे-शब में जब आँख से हो नींद भी गायब
चमकते आसमां में चाँद तारों से ग़ज़ल होती।२
चले ठण्डी पवन, मन झूमता लेता हिलोरें हो
उड़े खुशबू जो बागों में बहारों से ग़ज़ल होती।३
किसी को याद कर रोता है जब कोई अकेले में
बहे जो आँख से उन आबशारों से ग़ज़ल होती।४
फँसी हो जब भँवर कश्ती, हताशा घेर लेती है
दिखाई दूर से देते किनारों से ग़ज़ल होती।५
दबी आवाज़ में जिसको पुकारे रात भर 'नीरज'
तड़पती उन सदाओं से पुकारों से ग़ज़ल होती।६
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
मंगलवार, 7 जून 2022
पत्थर दिल
शीर्षक : पत्थर दिल
~~~❤️~~~❤️~~~❤️~~~
दोष देना, चिल्लाना
और अलग हो जाना
तुम्हार दु:ख नहीं,
तुम्हारी प्रवृति है।
तुम बिना स्वार्थ के साथ
नहीं रह पाते।
इसिलिये
ना तुम कभी सम्पूर्ण हो पाते हो,
और ना ही कभी मुझे
सम्पूर्ण होने का अहसास दे पाते हो।
मन की एकाग्रता को भंग कर
मन को आकर्षित करते हो
और दूर भाग जाते है।
बाद इसके मन तड़पता है
चोट खाता है और
ठोस हो जाता है।
फिर दुनिया इसे "पत्थर दिल"
कह कर बुलाती है।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
मुक्तक : दिल सुधरता नहीं। Dil Sudharta Nhi
मुक्तक : दिल सुधरता नहीं
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बह्र- 2122-2122-2122 212
❤️~~~❤️~~~❤️
गीत गाता इश्क़ के तो दर्द के गाता कभी।
बाज अपनी हरकतों से दिल नहीं आता कभी।
टूटना मंज़ूर इसको, छोड़ता ना आशिक़ी
दिल सुधर जाए हमारा हो नहीं पाता कभी।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर ( हरियाणा)

