ग़ज़ल
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मिले कोई जिसे मैं देख पाऊँ।
बुरा उसको लगे ना, जो सताऊँ।
सफ़र अच्छा रहा अब तक मगर यह
हो कोई साथ तो दिल की सुनाऊँ।
बिछड़ जाए अगर मुझसे कभी वो
उसी की याद में आँसू बहाऊँ।
लिखूँ मैं सोचकर उसको कविता
तलब उठने लगे तो गुनगुनाऊँ।
चौबारे से मुझे वो देखती हो
इशारे से उसे नीचे बुलाऊँ।
चमक आए नहीं जब तक ग़ज़ल में
जिगर के चाक सारे छेड़ जाऊँ।
उठाने में लगेगी देर घूंघट
अभी चल चाँद से बादल हटाऊँ।
फिरूँ गलियों में कर आवारगी मैं
कहीं जो देख लूँ उसको चिढ़ाऊँ।
कि जब घर खर्च वाली ही नहीं हो
सडूँ क्यूँ धूप में, जाकर कमाऊँ।
तुझे जो दे सके 'नीरज' सभी हक
उसी मुटियार आगे सर झुकाऊँ।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)


