शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

नज़ारों से ग़ज़ल होती।

शीर्षक : नज़ारो से ग़ज़ल होती।

 

तुम्हारे नक्श, चेहरे औ इशारों से ग़ज़ल होती।

कि ऐसे ही हसीं दिलकश नजारों से ग़ज़ल होती।१


सुरुरे-शब में जब आँख से हो नींद भी गायब

चमकते आसमां में चाँद तारों से ग़ज़ल होती।२


चले ठण्डी पवन, मन झूमता लेता हिलोरें हो

उड़े खुशबू जो बागों में बहारों से ग़ज़ल होती।३


किसी को याद कर रोता है जब कोई अकेले में

बहे जो आँख से उन आबशारों से ग़ज़ल होती।४


फँसी हो जब भँवर कश्ती, हताशा घेर लेती है

दिखाई दूर से देते किनारों से ग़ज़ल होती।५


दबी आवाज़ में जिसको पुकारे रात भर 'नीरज' 

तड़पती उन सदाओं से पुकारों से ग़ज़ल होती।६

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नीरज आहुजा

यमुनानगर (हरियाणा)

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