ग़ज़ल : सभी एक ही हैं ठिकाने अलग है।
ग़ज़ल
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तिरंगे पकड़ मुँह दिखाने अलग हैं।
मगर बम्ब-बारुद बनाने अलग हैं।१
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अमन चाहने का करें ढोंग जमकर,
लगा आग घर भी जलाने अलग हैं।२
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जिन्हें भौंकना देख कर शाह हरदम,
मिले हड्डियाँ तो दिवाने अलग हैं।३
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ज़हर घोल दिल में ग़ज़ल शे'र कहते,
कि हैं मुँह जितने ज़बाने अलग हैं।४
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कही बात कोई नहीं माननी पर,
सवालात सारे उठाने अलग हैं।५
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कि जो पार सरहद, वही देश अंदर,
सभी एक ही हैं, ठिकाने अलग हैं।६
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
पदान्त-: अलग हैं
तुकान्त -: दिखाने, बनाने, जलाने, दिवाने, ज़बाने, उठाने, बहाने, मुहाने
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