शनिवार, 11 अक्टूबर 2025

सभी एक ही हैं ठिकाने अलग हैं।

ग़ज़ल : सभी एक ही हैं ठिकाने अलग है

ग़ज़ल

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तिरंगे पकड़ मुँह दिखाने अलग हैं।

मगर बम्ब-बारुद बनाने अलग हैं।१

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अमन चाहने का करें ढोंग जमकर, 

लगा आग घर भी जलाने अलग हैं।२

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जिन्हें भौंकना देख कर शाह हरदम, 

मिले  हड्डियाँ  तो  दिवाने अलग हैं।३

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ज़हर घोल दिल में ग़ज़ल शे'र कहते, 

कि हैं मुँह जितने ज़बाने अलग हैं।४

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कही बात कोई नहीं माननी पर, 

सवालात  सारे  उठाने अलग हैं।५

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कि जो पार सरहद, वही देश अंदर, 

सभी एक ही हैं, ठिकाने अलग हैं।६

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नीरज आहुजा

यमुनानगर (हरियाणा)


पदान्त-: अलग हैं

तुकान्त -: दिखाने, बनाने, जलाने, दिवाने, ज़बाने, उठाने, बहाने, मुहाने

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