सोमवार, 20 जुलाई 2020

उम्मीद की रोशनी - Ummeed ki roshni


Neeraj kavitavali


मुक्तक 
बह्र- 2212-2212-2212-2212

धर  हाथ  पर  क्यूँ  हाथ  को  बैठे  रहो  मलते रहो

क्यूँ दोष  दो मिलता नहीं कुछ, आग में जलते रहो

किस्मत उसी की, कर्म की जो  राह पर चलता रहे

मन में  जगा  उम्मीद  की  तुम  रोशनी  चलते रहो

नीरज आहुजा
स्वरचित 

रविवार, 19 जुलाई 2020

सब रूप ज़िन्दगी के - sab roop zindagi ke



Neeraj kavitavali

हद  से  गुज़र  गये  हैं, ज़द  पार  हो  गये  हैं

सब   रूप   ज़िन्दगी  के  बेकार  हो  गये   हैं

पढ़ कर  जिसे  भुलाना आसान  है  बड़ा  ही 

बीते  हुए  दिनों  का   अख़बार  हो    गये  हैं

शनिवार, 18 जुलाई 2020

ताजमहल बनवा दूंगा - Tajmahal Banwa Dunga


Tajmahal Banwa Dunga, Neeraj Kavitavali

एक बार तो कहकर देखो, तुम पर जान लुटा दूंगा

कदम तुम्हारे आसमान के, तारे  तोड़  बिछा  दूंगा

बड़बोले   बनकर  माशूक़ा,  से  वादे माशूक़  करें

गर मेरी  मुमताज़ बनो तुम, ताजमहल बनवा दूंगा 

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

मंज़िलें इंतज़ार करती हैं - manzile intezar karti hai

neerajkavitavali
मंज़िलें इंतज़ार 
करती  हैं।।
राहगीरों की आह
भरती हैं।। 
कर्म के पथ पर
कोई चलकर आए
तो भर लेती हैं
बांहों में अपनी, 
हाथों की लकीरें
तभी तो इनसे
बहुत डरती हैं।।

नीरज आहुजा 
स्वरचित

गुरुवार, 16 जुलाई 2020

सब सुरक्षित रहें - Sab surakshit rahen



Neerajkavitavali

बह्र- 2122/2122/2122/212

सब  सुरक्षित  ही   रहें,  कोई  नहीं  बेहाल  हो

हो  नहीं   नुकसान  कोई  जान  हो या माल हो

आपदा  बरसात  बन  कर आ गयी जो  सामने

है घड़ी मुश्किल मगर, अरदास कर ना काल हो 

बुधवार, 15 जुलाई 2020

ख़्यालों का संघर्ष समय- khyalon ka sangharsh samay


ख़्याल आए थे, 
मर गए जे़हन मे ही!! 
दोषी कौन? 
पता नही!! 

Neeraj kavitavali


कुछ देर ठहरते
तो जीते कागज़ पर 
अपनी ही कोई उम्र, 
 
मगर संघर्ष नहीं कर पाये।
लगा के जैसे आत्मा मर गई, 
शरीर धारण करने से पहले। 

दाह से वाह के मध्य
ख़्यालों का संघर्ष समय होता है!