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मंगलवार, 21 जुलाई 2020
पेड़ की छाँव - ped ki chhaanv
"पेड़ की छाँव"
छूट रहा था
बदन से पसीना।
सर पर सूरज और
जेठ महिना ।
चल चल कर
थक गए थे पाँव।
दो घड़ी सुकून के लिए
बैठा पेड़ की छाँव ।
नीरज आहुजा
स्वरचित
सोमवार, 20 जुलाई 2020
उम्मीद की रोशनी - Ummeed ki roshni
मुक्तक
बह्र- 2212-2212-2212-2212
धर हाथ पर क्यूँ हाथ को बैठे रहो मलते रहो
क्यूँ दोष दो मिलता नहीं कुछ, आग में जलते रहो
किस्मत उसी की, कर्म की जो राह पर चलता रहे
मन में जगा उम्मीद की तुम रोशनी चलते रहो
नीरज आहुजा
स्वरचित
रविवार, 19 जुलाई 2020
सब रूप ज़िन्दगी के - sab roop zindagi ke
हद से गुज़र गये हैं, ज़द पार हो गये हैं
सब रूप ज़िन्दगी के बेकार हो गये हैं
पढ़ कर जिसे भुलाना आसान है बड़ा ही
बीते हुए दिनों का अख़बार हो गये हैं
शनिवार, 18 जुलाई 2020
ताजमहल बनवा दूंगा - Tajmahal Banwa Dunga
एक बार तो कहकर देखो, तुम पर जान लुटा दूंगा
कदम तुम्हारे आसमान के, तारे तोड़ बिछा दूंगा
बड़बोले बनकर माशूक़ा, से वादे माशूक़ करें
गर मेरी मुमताज़ बनो तुम, ताजमहल बनवा दूंगा
शुक्रवार, 17 जुलाई 2020
मंज़िलें इंतज़ार करती हैं - manzile intezar karti hai
मंज़िलें इंतज़ार
करती हैं।।
राहगीरों की आह
भरती हैं।।
कर्म के पथ पर
कोई चलकर आए
तो भर लेती हैं
बांहों में अपनी,
हाथों की लकीरें
तभी तो इनसे
बहुत डरती हैं।।
नीरज आहुजा
स्वरचित
गुरुवार, 16 जुलाई 2020
सब सुरक्षित रहें - Sab surakshit rahen

बह्र- 2122/2122/2122/212
सब सुरक्षित ही रहें, कोई नहीं बेहाल हो
हो नहीं नुकसान कोई जान हो या माल हो
आपदा बरसात बन कर आ गयी जो सामने
है घड़ी मुश्किल मगर, अरदास कर ना काल हो
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