मंगलवार, 18 अगस्त 2020

छुपते फिरते हैं - Chhupte firte hai


"छुपते फिरते हैं"

छुपते फिर रहे हैं

अपनी सोच से

द्वंद से, विचारों से। 

भाग जाना चाहते है 

खुद से कहीं दूर,

किसी वीरान जगह पर

जहाँ देख न पाएं

ढूंढ न पाएं खुद को।

Neeraj kavitavali

आँखें बंद कर लेना चाहते है

और दबा देना चाहते है

मन में कौंधते हुए

सवालों को

अंतर्द्वंद को

जैसे दबा दी जाती हैं

बहुत सी खबरें अक्सर 

सनसनी फैलने के डर से

शहर को बचाने के लिए।


बस इसी तरह

मस्तिष्क को भय और

आतंक के माहौल से

बचाने का एक तरीक़ा 

यह भी है कि

होने दिया जाए

जो हो रहा

और उसे ही

अपनी नियती मानकर

ऐसे रहें जैसे कि कुछ 

हुआ ही ना हो।

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

सोमवार, 17 अगस्त 2020

थोड़ी सी हँसी - Thodi si hasi


Neeraj kavitavali

"थोड़ी सी हँसी"

थोड़ी सी हँसी

बचाकर रखना

मेरे लिए

ताकी जब मैं तुमसे मिलूँ

तो तुम्हारे चेहरे पर

मेरे नाम की

एक हल्की सी

मुस्कान सजी हो।


अच्छा लगेगा मुझे

गर तुम ऐसा कर सको।

वैसे कोई उम्मीद नहीं

तुमसे कुछ पाने की

मगर फिर भी

पता नहीं क्यूँ

ख्वाहिश कर बैठता हूँ

जब भी देखता हूँ तुम्हें।

शायद सिर्फ इसलिए

कि मुझे तुमसे

बाते करना

तुम्हारे साथ वक्त बिताना और

तुम्हें यूँ ही कईं घंटो तक

टकटकी लगाकार देखना

अच्छा लगता है।

क्या तुमको भी

अच्छा लगता है

मुझसे बाते करना,

तुम्हारा नाम लेने भर से

मेरे चेहरे पर आने वाली

हल्की सी मुस्कान देखना?

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नीरज आहुजा 

स्वरचित रचना 

रविवार, 16 अगस्त 2020

शनिवार, 15 अगस्त 2020

चलते चलते राह में - Chalte chalte raah me

Neeraj kavitavali


"चलते चलते राह में"

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चलते चलते राह में

मिल जाते है जब हमें

अपने पुराने

खोए हुए पासवर्ड

तो धड़क उठता दिल

देखकर उनको

आता है तुफान

उफनती है लहरे

और टकराकर साहिल से

कह देना चाहती है

सब कुछ अपने दिल की 

मगर रोक लेते हैं खुद को

गोद में उनकी

एक बरस के छोटे से

किसी और आई डी से

जनरेट हुए

ओ टी पी देखकर।

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020

तुम अगर ख़फ़ा नहीं होती - Tum agar khafa nhi hoti

तुम अगर यूँ ख़फ़ा नहीं  होती

जिंदगी  ये  जफ़ा   नहीं  होती

आइना  देखकर  मुकर  जाऊं

अक्स में जिस दफ़ा नहीं होती

गुरुवार, 13 अगस्त 2020

चाँद सितारे निकल गये-chand sitare nikal gye

 

Neeraj Kavitavali

चाँद सितारे निकल गये
मुक्तक 

रात  हुई  जैसे  तैसे  कर, चाँद  सितारे  निकल  गये

छुपे हुए थे मन भीतर भी , भाव  तुम्हारे  निकल गये

आँखों की  सरिताओं पर, जो बांध बनाकर बैठा था

शब्द उतारा काग़ज़ पर तो, जल के धारे निकल गये
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नीरज आहुजा 
स्वरचित