मुक्तक :सितंबर ले के आया क्या

बह्र-1222/1222/1222/1222
सितंबर ले के आया क्या, बताएगा अभी ठहरो
रखा है पोटली में क्या, दिखाएगा अभी ठहरो
खुशी होगी कि गम होगा, बढ़ेगा दर्द कम होगा
कि बीतेंगे ये दिन जैसे, लुटाएगा अभी ठहरो
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नीरज आहुजा


लिए फिरते है मजनूँ जो गुलाबों में नहीं आता
सिखाया जा नहीं सकता निसाबों में नहीं आता
किताबे-इश्क़ को सब चाहते पढ़ना मगर ढाई
जो अक्षर प्रेम का होता किताबों में नहीं आता
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नीरज आहुजा




जैसा चाहा वैसा जीवन, जब यह ना बन पाता है
उम्मीदें पर पानी फिरता, दुख से जुड़ता नाता है
ले लेते अवसाद जनम फिर चिंता में डूबे रहते
क्या पाया क्या खोया में ही, समय गुजरता जाता है
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नीरज आहुजा