गुरुवार, 2 जुलाई 2020

साथ सभी के यारी रख

हिम्मत रख, खुद्दारी रख
कभी न तू लाचारी रख।
कर्म निरंतर करता जा
थक कर ना बेकारी रख। 
आएं जो अवरोध कभी
दोनों हाथ कटारी रख।
गिरना, उठना, चलना है
मन को न कभी भारी रख।
हार मान कर बैठ नहीं 
सफर हमेशा जारी रख।
हँसना सीख, हँसाना भी
साथ सभी के यारी रख।

~नीरज आहुजा 
स्वरचित 

बुधवार, 1 जुलाई 2020

कुछ गाड़ियां कभी नहीं रुकती

कुछ गाड़ियां
कभी नहीं रूकती
उन्हें हती है हमेशा
भागने की
दोड़ने की
अपने निर्दिष्ट
स्थान की तरफ
ना तो उन्हें कोई 
पंक्चर की दुकान
नज़र आती है
और न ही ढाबा
कोई स्पीड ब्रेकर भी
उनकी रफ्तार को
कम नहीं कर पाया
कुछ गाड़ियां यूँ ही रहती है
भागती दोड़ती
किसी सराय की परवाह 
किए बगैर
अपने गंतव्य की और
निरंतर ।
~नीरज आहुजा
स्वरचित 

मंगलवार, 30 जून 2020

लहरों से टकराना है - lehron se takrana hai

लहरो   से   टकराना  है, उनको  चीर  दिखाना  है
तुफानों  से  लड़ना  हमको, पार  समंदर  जाना है
राहों  में  आती  बाधा, या  अड़चन  जितनी  देखो
अनुगामी  बन  साहिल  के, सबको  दूर  हटाना है

बाण  चढ़ा  प्रत्यंचा   पर, पीछें   को  खींचा  जाता 
लक्ष्यों  को  निर्धारित कर, साहस  से  सींचा जाता
मंजिल मिलती तब हमको, चलें निरंतर जो पथ पर
एक आँख  इक  राह  रहे, लगे  सटीक  निशाना  है

सोमवार, 29 जून 2020

मजदूरी-एक कविता

जो तोड़ता है पतथर
क्या वही मजदूर है? 
या जो घुमाता दिन भर
बाईक सड़को पर
पिज्जा की डिलीवरी के लिए, 
उसको भी मजदूर कहेंगे। 
जो चलाता हो उंगलियों को
कैल्कुलेटर और की. बोर्ड पर,
खपाता हो दिमाग अपना
हिसाब किताब के लिए 
थकान तो उसे भी बहुत होती होगी।
एक लेखक जो
कुछ अच्छा लिखने की चाहत में
दिन भर सोचता है
और रात भर जागता है
जब तक कि कुछ अच्छा
लिख न ले तो उसे
चैन नहीं पड़ता। 
क्या इसे भी मजदूरी कहेंगे? 
या फिर मजदूरी होती है
मिट्टी को खोदना ही।

~नीरज आहुजा
स्वरचित

रविवार, 28 जून 2020

वर्चस्व की चाहत- varchasv ki chahat

तुम्हें मेरे
मंन के तंत्र पर
भरोसा नहीं
तुम चाहती हो
आपातकाल
जहाँ सिर्फ चले
तुम्हारी ही मन मर्जी
तुम्हारा ही वोट
तुम्हारा अधिकार।
तुम्ह पसंद नहीं
मुझे कोई और देखे, छूए
या बात करे
मैं जानता हूँ
तुम चाहती हो मुझपर
वर्चस्व अपना
सदा सदा के लिए। 

नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शनिवार, 27 जून 2020

हाँ वतन आजाद है- han vatan azaad hai

हाँ वतन आजाद है
हाँ वतन आजाद है।।

शीष कटे खेली थी होली
दिए प्राण खाकर गोली
चढ़ गए फांसी दे दी जान
ऐसे वीर बने महान
बलिदानों की धरा पर
हुआ भारत आबाद है
हां वतन आजाद है।। 

यूं ही नहीं आई आजादी
पहन के कुर्ता वस्तु खादी
दिया था नारा देश को
छोड़ दो फिरंगी भेष को
इसलिए हम संजीदा है
इसलिए तो हम शाद है 
हां वतन आजाद है।। 

इस धरती का खेल निराला
दिया फिरंगी देश निकाला
जो भी आया गया जान से
कहते है हम सभी शान से
दुश्मन की छाती पर हमने
हरदम भर दी गाद है
हाँ आज वतन आजाद है।।

नीरज आहुजा 
 स्वरचित