रविवार, 9 अगस्त 2020

चाँद को देखा करो - Chaand ko dekha karo


Neeraj kavitavali

"चाँद को देखा करो"

बह्र- 2122/2122-2122-212

मुक्तक 

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चाँद  को  देखा  करो, महताब  में ही  खुश  रहो

है हक़ीक़त कुछ नहीं बस ख़्वाब में ही खुश रहो

गर  नहीं  देती खुशी के पल  कभी  जो ज़िन्दगी

आँख से  बहते  रहें  जो, आब  में  ही खुश  रहो

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नीरज आहुजा 

स्वरचित रचना 

शनिवार, 8 अगस्त 2020

बात सारी भूल जा - Baat sari bhool ja

 

Neeraj kavitavali


बात सारी भूल जा
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मुक्तक 

कब तलक तू याद उसको  कर मरेगा दिल बता
जो  हुआ सो हो गया अब  बात  सारी  भूल जा
ज़िन्दगी आगे  पड़ी  है  और  पीछे   कुछ   नहीं
चार  दिन  जो  हैं  खुशी  से  जी  इसे आगे बढ़ा
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

दौ पंछी उड़ते जाएं - Do panchhi udate jaayen

Neeraj kavitavali

"दौ पंछी उड़ते जाएं"
मुक्तक 
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दौ  पंछी  उड़ते ही जाएं, जहाँ तहाँ मुड़ते जाएं

ढूंढे  अपना ठौर ठिकाना, कहाँ रुकें  कैसे पाएं

धीरे-धीरे  ना उम्मीदों, की काली  बदली  उमड़ी

भारी होते थके हुए पर, को  सिकोड़े लोट आएं
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

चाँद नगर में रहने वाले - chand nagar me rahne waale


Neeraj kavitavali

 "चाँद नगर में रहने वाले"

मुक्तक

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चाँद नगर में रहनेवाले, ख़्वाब सितारों के बुनते

कर विश्वास उसी पर लेते, लोगों से जैसा सुनते

ढोल दूर के लगे सुहाने, देख हक़ीक़त डर जाएं

फूल छोड़ देते  जीवन में, बाकी  के  कांटे चुनते

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नीरज आहुजा

स्वरचित 

बुधवार, 5 अगस्त 2020

तू हमको हनुमान लगा - tu hamko hnumaan lga


Neeraj kavitavali

"तू हमको हनुमान लगा"

वर्षों  से लंबित कारज को,  पूरा करता जान लगा 
तेरे  हाथों  पूरे   होंगे, कौन  सका  अनुमान  लगा
दुनिया जो मर्जी कहती हो, राम दूत तू  बन आया
हम सब  वानर सेना तेरी, तू हमको हनुमान  लगा

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

मन कितना समझाकर देखा - mann kitna samjhakar dekha


Neeraj Kavitavali

"मन कितना समझाकर देखा"
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 मुक्तक 

बहलाकर फुसलाकर देखा, मन कितना  समझाकर देखा
काम वही  फिर करता  है  ये, धोखा जिसमें खाकर देखा
रोज   उठाता  हूँ   मैं  इसको,  गिरा   पड़ा   जब  देखूँ तो
मुकर गया कथनी से अपनी, काग़ज़ पर लिखवाकर देखा
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नीरज आहुजा 
स्वरचित