लावणी छंद : ज़हर वाली थाली
विधान :-
जिस थाली में ज़हर दिया है, उस थाली में छेद करो।
कलाकार हैं या पाखंडी, दोनों में अब भेद करो।
जनता ने विश्वास किया तो, तुमको नायक कह डाला।
लेकिन सर चढ़ बैठ गये तुम, जैसे चढ़ती है हाला।
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नीरज आहुजा
जिस थाली में ज़हर दिया है, उस थाली में छेद करो।
कलाकार हैं या पाखंडी, दोनों में अब भेद करो।
जनता ने विश्वास किया तो, तुमको नायक कह डाला।
लेकिन सर चढ़ बैठ गये तुम, जैसे चढ़ती है हाला।
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नीरज आहुजा
ग़ज़ल : जिनकी ऊँची दुकान होती है
बह्र- 2122 1212 22
जिनकी ऊँची दुकान होती है
तो अकड़ आसमान होती है
मार देते हैं तीर नज़रों के
आँख में क्या कमान होती है
ज़िन्दगी मौत की तरफ़ बहती
मौत जानिब ढलान होती है
ख़ास कुछ काम भी नहीं होता
काम देखूँ, थकान होती है
टूट जाते हैं इस लिए रिश्ते
तल्ख़ अक्सर ज़बान होती है
छूट दिल यह कभी नहीं पाता
याद ऐसी लगान होती है
हम किनारें हैं मिल नहीं सकते
इक नदी दरमियान होती है
दिल कहे कुछ दिमाग कुछ, दोनो
में बहुत खींच-तान होती है
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नीरज आहुजा
तारों ने चंदा से पूछा, जब आकर बारी बारी
नाम बता दिलबर का अपने, ना कर हमसे मक्कारी
चांद जमीं की और इशारा, करके फिर बतलाता है
खिड़की खोल मुझे जो देखें, सबसे है मेरी यारी
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नीरज आहुजा
चाँद अकेला देख, सितारे, करते जब छेड़ा खानी
कोई आँख मिलाना चाहे, कोई करता शैतानी
उठा पटक कर आसमान से, जब इनको फेंका जाता
टूटा तारा देख दुआएँ, मांगे हम बन अज्ञानी
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नीरज आहुजा
आज कुकुभ छंद पर अपना पहला प्रयास
विधान:-
💡कुकुभ छन्द अर्द्धमात्रिक छन्द है।
💡इस छन्द में चार पद होते हैं।
💡प्रत्येक पद में 30 मात्राएँ होती हैं।
💡प्रत्येक पद में दो चरण होते हैं। जिनकी यति 16-14 निर्धारित होती है।
💡दो-दो पदों की तुकान्तता का नियम है।
नोट :- प्रथम चरण यानि विषम चरण के अन्त को लेकर कोई विशेष आग्रह नहीं है। किन्तु, पदान्त दो गुरुओं से होना अनिवार्य है। इसका अर्थ यह हुआ कि सम चरण का अन्त दो गुरु से ही होना चाहिये। आईए अब इस पर एक प्रयास देखें..
दूर जहाँ तक भी दिखता है, सममल बंजर धरती है।
सूख चुके हैं दरिया सारे, आशा पल पल मरती है।
ठूंठ हुए पेडों से अपना, छोड़ चुकी है घर छाया।
गिद्ध मंडराते देख रहे, जीवित है कब तक काया।
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नीरज आहुजा
बह्र - 2122 2122 2122 212
इश्क़ में अक्सर हमारा, हाल होता है यही
फैसला जज़्बात में ले, काम करते हैं वही
छोड़ दें रिश्ते पुराने, ढल नये किरदार में
सोच ना पाते कभी यह, क्या गलत है क्या सही
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नीरज आहुजा