शनिवार, 20 जून 2020
शुक्रवार, 19 जून 2020
हार को जीत में बदलना है- haar ko jeet me badalna hai
कुंदन बनना है, जलना है
हार को जीत में बदलना है
हाथ पर हाथ धरे क्यों बैठे
हम मुश्किल से डरे क्यों बैठे
पथ पर जो अवरोध बिछे हो
उनको पाँव तले कुचलना है
हो जिजीविषा विश्वास अटल
धैर्य बुद्धि में, हो बाहों में बल
विफलता दामन पकड़े अगर
झटक कर हाथ निकलना है
हो दूर भले तट जितना भी
रख धैर्य मन में, बल उतना ही
मझधार ही जीवन लक्ष्य नहीं
माझी को भंवर से निकलना है
~नीरज आहुजा
सर्वाधिकार सुरक्षित
गुरुवार, 18 जून 2020
भूली बिसरी गलियाँ- bhooli bisri galiyan
वो भूली बिसरी गलियाँ पुरानी
कहाँ छोड़ आए है हम वो कहानी
वो गुजरा हुआ बचपन याद करलें
ढलती हुई भूलकर हम जवानी
तपती हुई धूप में तर बदन हो
मन ये मगर खेलने मे मगन हो
बुलाते परिंदों को घोंसले थे
मगर बात हमने कहाँ थी मानी
लथपथ पसीने में हम झूमते थे
भरी दोपहर गलियां घूमते थे
गले सूखते थे दोस्तों के ही घर पे
घर अपने कब हम पीते थे पानी
झूलों से गिर के हंसने थे लगते
कपड़े हों गंदे तो चेहरे थे जगते
किसको बताएं अपनी गुजरिया
पेड़ों पे लटकी कहाँ है निशानी
~नीरज आहुजा
मंगलवार, 16 जून 2020
तुम और तुम्हारी चाय-Tum our tumhari chai
कविता- तुम और तुम्हारी चाय
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मैं चाय नहीं पीता था
तुम्हें पीते हुए देखा
तो लत लग गई
चाय की/तुम्हारी
अचानक तुम कब
चाय पीते पीते
काॅफ़ी पीने लगे
पता ही नहीं चला
और मैं आज भी
चाय के लिए
तरसता रहता हूँ
तुम बनाते थे
तो मैं पीता था
तुम्हें मालूम था न?
मुझे चाय बनानी नहीं आती।
तुम्हारे वाला किस्सा फिर कभी...
~नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
सर्वाधिकार सुरक्षित
सोमवार, 15 जून 2020
लहरें और चट्टान- lehren aur Chattaan
"लहरें और चट्टान"
चट्टाने समेटती है,
रोकती है
विकराल विध्वंसक
रूप को
स्वयं के नष्ट होने तक।
लहरे करती है
प्रतिपादन
अपने स्वच्छंद
स्वरूप का।
कोई रुष्ट है
तो कोई पुष्ट है
दोनों ही अपनी प्रवृति
अपना सोच-विचार लिए
रहते हैं अनवरत
अपने कार्य पथ पर अडिग।
लहरें काटती है
पीटती है
हर पल हर क्षण।
चट्टाने सहती है
चुप रहती है
सकारात्मकता
लिए हुए
लहरों के प्रहार को
बना लेती है श्रृंगार अपना।
लहरों ने चट्टानों में
अवरोध देखा है
उसकी सूझबूझ
सहनशीलता, प्रेम और
सोच विचार नहीं देखा।
~नीरज आहुजा
स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित
रविवार, 14 जून 2020
तुम बिन - tum bin
उस रात पढ़ा था
मैंने तुम्हें और तुम्हारी
प्रेम कविताएं को!
और बनाकर उनकी कश्ती
बहा दिया था नदी में
क्योंकि मैं
देखना चाहता था
तुम और तुम्हारी
प्रेम कविताएं
नदी के हिचकोलों पर
तैरती हुई
कैसी दिखती है
लेकिन तुम लोटकर
नहीं आई
और मैं बैठा रहा
उस दिन तुम बिन
अकेले चुपचाप
नदी किनारे।
शायद तुम्हें और
तुम्हारी प्रेम कविताओं को
लहर मिल गई थी
और मुझे मिला था
तो सिर्फ अफसोस।।
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