मुक्तक : तथाकथित मानवतावादी
कहते जो आवाज़ उठाओ, चुप बैठे हैं आज सभी
तथाकथित मानवतावादी, झूठों के सरताज सभी
पहले से निर्धारित मसलों, पर मनमर्जी से बोलें
नाम बड़े दर्शन छोटे हों, ऐसे उनके काज सभी
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नीरज आहुजा

बह्र - 2122 2122 2122 212
शाम धीरे से गुज़रना, रात रहती है उधर
ताक में बैठी तुम्हारे, वो लगा पैनी नज़र
चाँद ने आकर कहा, कुछ देर पहले कान में
रात की बदमाशियों की, मैं तुम्हें कर दूँ ख़बर
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नीरज आहुजा

हात के बढ़ाने पर हात क्यों नहीं करते
ठीक सरहदों पर हालात क्यों नहीं करते
गोलियाँ चलाकर मज़लूम मार देते हो
और पूछते हो फिर बात क्यों नहीं करते
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नीरज आहुजा
