मुक्तक : दिल लगाने आ गये
बह्र - 2122 2122 2122 212
बह्र - 2122 2122 2122 212
बह्र- 2122 1212 22
याद में नग़्मगी नहीं होती
आँख मेरी भरी नहीं होती
तुम अगर ना मुझे मिले होते
मुझसे यूँ शायरी नहीं होती
हसरतें टूट कर बिखरती हैं
अब यहाँ ज़िन्दगी नहीं होती
चाँद बनकर न दिल धड़कना तुम
दिल में जब चाँदनी नहीं होती
दिल कहीं और मैं कहीं खोया
इस तरह बेखुदी नहीं होती
मैं कदम से मिला कदम चलता
तुम अगर सोचती नहीं होती
जब से हो छोड़ कर गये मुझको
मुझसे फिर दिल्लगी नहीं होती
बात कुछ तो अलग लगी तुम में
वर्ना तुम आखिरी नहीं होती
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नीरज आहुजा
जिस थाली में ज़हर दिया है, उस थाली में छेद करो।
कलाकार हैं या पाखंडी, दोनों में अब भेद करो।
जनता ने विश्वास किया तो, तुमको नायक कह डाला।
लेकिन सर चढ़ बैठ गये तुम, जैसे चढ़ती है हाला।
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नीरज आहुजा
ग़ज़ल : जिनकी ऊँची दुकान होती है
बह्र- 2122 1212 22
जिनकी ऊँची दुकान होती है
तो अकड़ आसमान होती है
मार देते हैं तीर नज़रों के
आँख में क्या कमान होती है
ज़िन्दगी मौत की तरफ़ बहती
मौत जानिब ढलान होती है
ख़ास कुछ काम भी नहीं होता
काम देखूँ, थकान होती है
टूट जाते हैं इस लिए रिश्ते
तल्ख़ अक्सर ज़बान होती है
छूट दिल यह कभी नहीं पाता
याद ऐसी लगान होती है
हम किनारें हैं मिल नहीं सकते
इक नदी दरमियान होती है
दिल कहे कुछ दिमाग कुछ, दोनो
में बहुत खींच-तान होती है
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नीरज आहुजा
तारों ने चंदा से पूछा, जब आकर बारी बारी
नाम बता दिलबर का अपने, ना कर हमसे मक्कारी
चांद जमीं की और इशारा, करके फिर बतलाता है
खिड़की खोल मुझे जो देखें, सबसे है मेरी यारी
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नीरज आहुजा
चाँद अकेला देख, सितारे, करते जब छेड़ा खानी
कोई आँख मिलाना चाहे, कोई करता शैतानी
उठा पटक कर आसमान से, जब इनको फेंका जाता
टूटा तारा देख दुआएँ, मांगे हम बन अज्ञानी
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नीरज आहुजा