गुरुवार, 6 अगस्त 2020

चाँद नगर में रहने वाले - chand nagar me rahne waale


Neeraj kavitavali

 "चाँद नगर में रहने वाले"

मुक्तक

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चाँद नगर में रहनेवाले, ख़्वाब सितारों के बुनते

कर विश्वास उसी पर लेते, लोगों से जैसा सुनते

ढोल दूर के लगे सुहाने, देख हक़ीक़त डर जाएं

फूल छोड़ देते  जीवन में, बाकी  के  कांटे चुनते

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नीरज आहुजा

स्वरचित 

बुधवार, 5 अगस्त 2020

तू हमको हनुमान लगा - tu hamko hnumaan lga


Neeraj kavitavali

"तू हमको हनुमान लगा"

वर्षों  से लंबित कारज को,  पूरा करता जान लगा 
तेरे  हाथों  पूरे   होंगे, कौन  सका  अनुमान  लगा
दुनिया जो मर्जी कहती हो, राम दूत तू  बन आया
हम सब  वानर सेना तेरी, तू हमको हनुमान  लगा

मंगलवार, 4 अगस्त 2020

मन कितना समझाकर देखा - mann kitna samjhakar dekha


Neeraj Kavitavali

"मन कितना समझाकर देखा"
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 मुक्तक 

बहलाकर फुसलाकर देखा, मन कितना  समझाकर देखा
काम वही  फिर करता  है  ये, धोखा जिसमें खाकर देखा
रोज   उठाता  हूँ   मैं  इसको,  गिरा   पड़ा   जब  देखूँ तो
मुकर गया कथनी से अपनी, काग़ज़ पर लिखवाकर देखा
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

सोमवार, 3 अगस्त 2020

बीत सकल मधुमास गया - Beet sakal madhu maas gya


Neeraj kavitavali


"बीत सकल मधु मास गया" 
लावणी-छंद
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मैं  अकेलाा  बेपरवाह  क्यूँ,  तेरा   भी  तो  हिस्सा है
झांक जरा  तू  देख  गिरेबां, बीत गयाा जो किस्सा है
हर बार दिया  ताना मुझको, जब भी तेरे  पास  गया
बीत गयी अब रैना भुगतो, बीत सकल मधुमास गया
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

रविवार, 2 अगस्त 2020

तरह तरह के हथकंडे - tarah tarah ke hathkande


Neeraj kavitavali

"तरह तरह के हथकंडे" 
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तरह  तरह  के  हथकंडे  जब,  चलते  दुनियादारी में

भेद  नहीं  कर  पाते  हैं फिर, यार  और  अय्यारी  में

रहे भरोसा नहीं  किसी पर, हर  पल  मन संदेह  करे

कौन खड़ा है साथ  सहज हो, कौन खड़ा मक्कारी में

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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

डायरी के पन्ने - Diary ke panne

Diary ke panne

मिला कुछ पुराना सा
अधूरा सा, 
खोले जब डायरी के
कुछ पन्ने तो
जो कि अब कभी
पूरे नहीं हो पाएंगे! 

Neeraj Kavitavali


हम छोड़ देते है
कुछ चीजे यूँ ही अधूरी 

फिर रह जाती है वो
उम्र भर के लिए
मन की टीस बनकर 

जैसे किसी घर दीवार
जिसमें दरारे पड़ने लगें
और उसकी मरम्मत ना हो
तो धीरे धीरे घर किसी
खंडहर मे तब्दील हो जाता है 

ठीक वैसे ही हमारे 
हमारे खयाल
हमारी इच्छाएँ
हमारे रिश्ते भी सब
मरम्मत के अभाव में
तब्दील हो जाते है
किसी न किसी खंडहर में। 
होंसला न करना
हिम्मत हार जाना
छोड़ कर पूराना
आगे की तरफ बढ़ जाना
यही सब करते रहते है
हम उम्र भर। 
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नीरज आहुजा 
स्वरचित