"वक़्त की मार"
बह्र- 2122/2122/2122/212
मुक्तक
वक़्त के हाथों पड़ी है मार जब इन्सान को
याद करता आदमी फिर हर समय भगवान को
वक़्त तो आता नहीं है लोटकर गुजरा हुआ
माफ़ियाँ पर मांगता रहता पकड़कर कान को
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
"दो घड़ी के लिए"
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मुक्तक
ज़िन्दगी जल रही और उठता धुआँ
दो घड़ी के लिए भी सुकूँ है कहाँ
चैन से जी रहा सो रहा कौन है
दर्द ही दर्द है, देखते हम जहाँ
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
"चाँद को देखा करो"
बह्र- 2122/2122-2122-212
मुक्तक
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चाँद को देखा करो, महताब में ही खुश रहो
है हक़ीक़त कुछ नहीं बस ख़्वाब में ही खुश रहो
गर नहीं देती खुशी के पल कभी जो ज़िन्दगी
आँख से बहते रहें जो, आब में ही खुश रहो
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना