तुम अगर यूँ ख़फ़ा नहीं होती
जिंदगी ये जफ़ा नहीं होती
आइना देखकर मुकर जाऊं
अक्स में जिस दफ़ा नहीं होती
तुम अगर यूँ ख़फ़ा नहीं होती
जिंदगी ये जफ़ा नहीं होती
आइना देखकर मुकर जाऊं
अक्स में जिस दफ़ा नहीं होती
"दो घड़ी के लिए"
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मुक्तक
ज़िन्दगी जल रही और उठता धुआँ
दो घड़ी के लिए भी सुकूँ है कहाँ
चैन से जी रहा सो रहा कौन है
दर्द ही दर्द है, देखते हम जहाँ
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
"चाँद को देखा करो"
बह्र- 2122/2122-2122-212
मुक्तक
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चाँद को देखा करो, महताब में ही खुश रहो
है हक़ीक़त कुछ नहीं बस ख़्वाब में ही खुश रहो
गर नहीं देती खुशी के पल कभी जो ज़िन्दगी
आँख से बहते रहें जो, आब में ही खुश रहो
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना