गुरुवार, 18 जून 2020

भूली बिसरी गलियाँ- bhooli bisri galiyan

वो भूली बिसरी गलियाँ पुरानी
कहाँ छोड़ आए है हम वो कहानी
वो गुजरा हुआ बचपन याद करलें
ढलती हुई भूलकर हम जवानी 

तपती हुई धूप में तर बदन हो
मन ये मगर खेलने मे मगन हो
बुलाते परिंदों को घोंसले थे
मगर बात हमने कहाँ थी मानी

लथपथ पसीने में हम झूमते थे
भरी दोपहर गलियां घूमते थे
गले सूखते थे दोस्तों के ही घर पे
घर अपने कब हम पीते थे पानी

झूलों से गिर के हंसने थे लगते
कपड़े हों गंदे तो चेहरे थे जगते
किसको बताएं अपनी गुजरिया 
पेड़ों पे लटकी कहाँ है निशानी

~नीरज आहुजा

मंगलवार, 16 जून 2020

तुम और तुम्हारी चाय-Tum our tumhari chai

कविता- तुम और तुम्हारी चाय

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मैं चाय नहीं पीता था
तुम्हें पीते हुए देखा
तो लत लग गई
चाय की/तुम्हारी
अचानक तुम कब
चाय पीते पीते
काॅफ़ी पीने लगे
पता ही नहीं चला
और मैं आज भी
चाय के लिए
तरसता रहता हूँ
तुम बनाते थे
तो मैं पीता था
तुम्हें मालूम था न?
मुझे चाय बनानी नहीं आती।

तुम्हारे वाला किस्सा फिर कभी...

~नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
सर्वाधिकार सुरक्षित 

सोमवार, 15 जून 2020

लहरें और चट्टान- lehren aur Chattaan

"लहरें और चट्टान" 

चट्टाने समेटती है,
रोकती है
विकराल विध्वंसक 
रूप को
स्वयं के नष्ट होने तक। 
लहरे करती है
प्रतिपादन
अपने स्वच्छंद
स्वरूप का। 
कोई रुष्ट है
तो कोई पुष्ट है
दोनों ही अपनी प्रवृति
अपना सोच-विचार लिए 
रहते हैं अनवरत
अपने कार्य पथ पर अडिग। 
लहरें काटती है
पीटती है
हर पल हर क्षण।
चट्टाने सहती है
चुप रहती है 
सकारात्मकता
लिए हुए 
लहरों के प्रहार को
बना लेती है श्रृंगार अपना। 
लहरों ने चट्टानों में
अवरोध देखा है
उसकी सूझबूझ
सहनशीलता, प्रेम और
सोच विचार नहीं देखा।

~नीरज आहुजा
स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित 

रविवार, 14 जून 2020

तुम बिन - tum bin


उस रात पढ़ा था
मैंने तुम्हें और तुम्हारी
प्रेम कविताएं को! 
और बनाकर उनकी कश्ती
बहा दिया था नदी में
क्योंकि मैं
देखना चाहता था
तुम और तुम्हारी
प्रेम कविताएं
नदी के हिचकोलों पर
तैरती हुई
कैसी दिखती है
लेकिन तुम लोटकर
नहीं आई
और मैं बैठा रहा
उस दिन तुम बिन
अकेले चुपचाप 
नदी किनारे। 
शायद तुम्हें और
तुम्हारी प्रेम कविताओं को
लहर मिल गई थी
और मुझे मिला था
तो सिर्फ अफसोस।। 

शनिवार, 13 जून 2020

गुजर जाओ चुपचाप - chup chaap guzar jao

चुपचाप गुजर जाओ
हलके से होले से
दबे पांव
करीब से मेरे
मुझे पता भी न चले
कि तुम कब आए थे
और कब चले गए।
तुम भी ओढ़ लो
मेरी खुशियों का चोला
और हो जाओ
मेरी खुशियों की तरह
ही मुक्तसर। 
ये कब आती है और
कब चली जाती है
मुझे पता ही नहीं चलता।

महिना मोहब्बत वाला - mahina mohobbat wala

वैलेंटाइन स्पैशल

महीना मोहब्बत वाला।
बने हर कोई दिल वाला।।

बन ठन के निकले हैं घर से।
समझे है, खुद को नन्दलाला।।

सूनी पड़ी है मोहब्बत कि गलिया।
हाथों में लेके फिरे प्रीत का प्याला।।

बन्द कमरा जहां सूरज कि पहुंच नहीं।
इन तमाम अन्धेरा को कहे हैं उजाला।।

~नीरज आहुजा 

स्वरचित