सोमवार, 3 अगस्त 2020

बीत सकल मधुमास गया - Beet sakal madhu maas gya


Neeraj kavitavali


"बीत सकल मधु मास गया" 
लावणी-छंद
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मैं  अकेलाा  बेपरवाह  क्यूँ,  तेरा   भी  तो  हिस्सा है
झांक जरा  तू  देख  गिरेबां, बीत गयाा जो किस्सा है
हर बार दिया  ताना मुझको, जब भी तेरे  पास  गया
बीत गयी अब रैना भुगतो, बीत सकल मधुमास गया
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

रविवार, 2 अगस्त 2020

तरह तरह के हथकंडे - tarah tarah ke hathkande


Neeraj kavitavali

"तरह तरह के हथकंडे" 
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तरह  तरह  के  हथकंडे  जब,  चलते  दुनियादारी में

भेद  नहीं  कर  पाते  हैं फिर, यार  और  अय्यारी  में

रहे भरोसा नहीं  किसी पर, हर  पल  मन संदेह  करे

कौन खड़ा है साथ  सहज हो, कौन खड़ा मक्कारी में

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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शनिवार, 1 अगस्त 2020

डायरी के पन्ने - Diary ke panne

Diary ke panne

मिला कुछ पुराना सा
अधूरा सा, 
खोले जब डायरी के
कुछ पन्ने तो
जो कि अब कभी
पूरे नहीं हो पाएंगे! 

Neeraj Kavitavali


हम छोड़ देते है
कुछ चीजे यूँ ही अधूरी 

फिर रह जाती है वो
उम्र भर के लिए
मन की टीस बनकर 

जैसे किसी घर दीवार
जिसमें दरारे पड़ने लगें
और उसकी मरम्मत ना हो
तो धीरे धीरे घर किसी
खंडहर मे तब्दील हो जाता है 

ठीक वैसे ही हमारे 
हमारे खयाल
हमारी इच्छाएँ
हमारे रिश्ते भी सब
मरम्मत के अभाव में
तब्दील हो जाते है
किसी न किसी खंडहर में। 
होंसला न करना
हिम्मत हार जाना
छोड़ कर पूराना
आगे की तरफ बढ़ जाना
यही सब करते रहते है
हम उम्र भर। 
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

कौन चाहता सम करना - kon chahta sam karna

Neeraj Kavitavali

"कौन चाहता सम करना"

ऊँची  कर  आवाजें  अपनी, दूजे  की  मद्धम करना
शौर शराबे तले  दबा सच, झूठ जिता परचम करना 
सब  ऐसी  दुनियादारी  में, हार  जीत  में  उलझ गए 
सब  चाहें  वर्चस्व  जमाना, कौन चाहता  सम करना

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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

अधूरा सफ़र - adhoora safar


Neerajkavitavali

"अधूरा सफर"

मैं जानता हूँ,
मैं छोड़ दूंगा
ये सफर भी अधूरा 
और शायद पकड़ लूंगा
 कोई नयी अनजानी राह, 
कोई पगडंडी
या फिर कोई कच्चा रास्ता 
जो कि अचानक से
नजर आ जाता है
पक्की सड़कों पर चलते हुए
नीचे की तरफ।
क्योंकि मैं जानता हूँ
मेरी कोई मंजिल नहीं,
कोई पड़ाव नहीं,
कोई किनारा नहीं
जहांँ बैठकर कुछ पल के लिए
मैं ये सोच सकूँ कि मैंने
क्या पाया और क्या खोया
इस सफर पर चलते हुए। 
मैं तो चलते चलते
छोड़ दूंगा
एक दिन ये सांसे भी
बिना किसी
आखिरी ख्वाहिश के।
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नीरज आहुजा 
स्वरचित 

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

पहले जैसी बात नहीं - pahle jaisi baat nhi


Neerajkavitavali


"पहले जैसी बात नहीं" 

सूरज उगता ढल जाता है होते अब दिन रात नहीं
समय गुजरता रहता है बस पहले जैसी बात नहीं

छोटी-छोटी खुशियों में जब, जीवन का रस लेते थे
हम बचपन में  बेमतलब की, बातों पर हँस लेते थे
ठूंठ हुए  मन की डालों पर, उगती  कोई पात  नहीं
समय  गुजरता  रहता है बस पहले जैसी बात नहीं

कश्ती अपनी और चली किस, धारा देखा करते थे
कूद पड़े  कीचड़  देखा  ना, गारा   देखा  करते  थे
सावन आते जाते  रहते, होती  अब  बरसात  नहीं
समय गुजरता रहता है बस, पहले जैसी  बात नहीं