दोहा-मुक्तक
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खेल खेल में खो दिया जीवन यह अनमोल।
भरी जवानी प्यार में देता सारी रोल।
आई लाठी हाथ में, मुँह से कहता राम
सांसों की टूटी लड़ी, कुछ ना निकले बोल।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
दोहा-मुक्तक
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खेल खेल में खो दिया जीवन यह अनमोल।
भरी जवानी प्यार में देता सारी रोल।
आई लाठी हाथ में, मुँह से कहता राम
सांसों की टूटी लड़ी, कुछ ना निकले बोल।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
मुक्तक : जैसे होती घरवाली
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कभी दिखेगा चाँद कटोरी, कभी दिखे जैसे थाली।
छिप जाता है गुस्से में यह, ओढ़ कभी छाया काली।
बदल बदल कर रूप दिखाता, नाच नचाता है मन को
मनमर्जी का मालिक है यह, जैसे होती घरवाली
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)
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नीरज आहुजायमुनानगर (हरियाणा)
दर्द हमारे कौन सुनेगा।
कह कह हारे कौन सुनेगा।
टूट गई उम्मीदे सारी।
तिनका तिनका बारी बारी।
बीच भंवर है कश्ती अपनी
दूर किनारे कौन सुनेगा।
मुश्किल है जी पाना अब तो।
देख सभी चुप बैठे रब तो।
बिन तेरे हालत को अपनी
पालन हारे कौन सुनेगा।
कोशिश कर कर हार गये हम।
मन की सारी मार गये हम।
दर दर भटके लेकर दिल की
पत्थर सारे कौन सुनेगा।
धरती है यह आग उगलती।
आस नहीं अब कोई पलती।
आँख उठा फिर देखा नभ को
चाँद सितारे कौन सुनेगा।
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नीरज आहुजा
यमुनानगर (हरियाणा)