सोमवार, 15 जून 2020

लहरें और चट्टान- lehren aur Chattaan

"लहरें और चट्टान" 

चट्टाने समेटती है,
रोकती है
विकराल विध्वंसक 
रूप को
स्वयं के नष्ट होने तक। 
लहरे करती है
प्रतिपादन
अपने स्वच्छंद
स्वरूप का। 
कोई रुष्ट है
तो कोई पुष्ट है
दोनों ही अपनी प्रवृति
अपना सोच-विचार लिए 
रहते हैं अनवरत
अपने कार्य पथ पर अडिग। 
लहरें काटती है
पीटती है
हर पल हर क्षण।
चट्टाने सहती है
चुप रहती है 
सकारात्मकता
लिए हुए 
लहरों के प्रहार को
बना लेती है श्रृंगार अपना। 
लहरों ने चट्टानों में
अवरोध देखा है
उसकी सूझबूझ
सहनशीलता, प्रेम और
सोच विचार नहीं देखा।

~नीरज आहुजा
स्वरचित
सर्वाधिकार सुरक्षित 

रविवार, 14 जून 2020

तुम बिन - tum bin


उस रात पढ़ा था
मैंने तुम्हें और तुम्हारी
प्रेम कविताएं को! 
और बनाकर उनकी कश्ती
बहा दिया था नदी में
क्योंकि मैं
देखना चाहता था
तुम और तुम्हारी
प्रेम कविताएं
नदी के हिचकोलों पर
तैरती हुई
कैसी दिखती है
लेकिन तुम लोटकर
नहीं आई
और मैं बैठा रहा
उस दिन तुम बिन
अकेले चुपचाप 
नदी किनारे। 
शायद तुम्हें और
तुम्हारी प्रेम कविताओं को
लहर मिल गई थी
और मुझे मिला था
तो सिर्फ अफसोस।। 

शनिवार, 13 जून 2020

गुजर जाओ चुपचाप - chup chaap guzar jao

चुपचाप गुजर जाओ
हलके से होले से
दबे पांव
करीब से मेरे
मुझे पता भी न चले
कि तुम कब आए थे
और कब चले गए।
तुम भी ओढ़ लो
मेरी खुशियों का चोला
और हो जाओ
मेरी खुशियों की तरह
ही मुक्तसर। 
ये कब आती है और
कब चली जाती है
मुझे पता ही नहीं चलता।

महिना मोहब्बत वाला - mahina mohobbat wala

वैलेंटाइन स्पैशल

महीना मोहब्बत वाला।
बने हर कोई दिल वाला।।

बन ठन के निकले हैं घर से।
समझे है, खुद को नन्दलाला।।

सूनी पड़ी है मोहब्बत कि गलिया।
हाथों में लेके फिरे प्रीत का प्याला।।

बन्द कमरा जहां सूरज कि पहुंच नहीं।
इन तमाम अन्धेरा को कहे हैं उजाला।।

~नीरज आहुजा 

स्वरचित 



शुक्रवार, 29 मई 2020

सत्य सत्य में अंतर satya satya me antar

कुछ भी सत्य से
बड़ा नहीं।
सत्य अटल है।
मेरे और तुम्हारे
नजरिए में अंतर
सत्य को पलट नहीं सकता।
हम जिसे सत्य कहते है
वो धारणा है
मेरी तुम्हारी
दोनों की अलग अलग।
जो तुम देखना चाहते हो
वो मैं नहीं, और जो मैं
देखना चाहता हूँ
वो तुम नहीं।
हम दोनों में कभी
एकरूपता नहीं आती।
भेद यही है,
समस्या भी यही है
और झगड़ा भी यही।
हम सत्य 
नहीं देखते
अपनी अपनी
जरूरत देखते है,
अपनी इच्छाएं और
अपनी आकांक्षाओं में लिप्त
एक दूसरे पर
आरोप प्रत्यारोप
मढ़ते है।
हम सत्य नही देखते
हम धारणाएं बनाते है और
उन्हें सत्य बोल देते है।
सत्य को सुनने और
देखने के बाद भी
समझने की
आवश्यकता होती है।

~नीरज आहुजा 
स्वरचित रचना 

रविवार, 17 मई 2020

स्मृतियाँ - memories never change

हाँ, साथ थे हम
कुछ साल पहले। 
मिलते थे रोज
एक दूजे से
हाँ, होता था आभास
प्रेम का। 

अब नहीं मिलते
लेकिन प्रेम फिर भी
वैसा ही है, 
और तुम भी तो
बिल्कुल नहीं बदली
वैसी ही हो
जैसे बिछड़ते समय
देखा था तुम्हे। 
लेकिन मैं बदल रहा हूँ, 
हर-पल, हर-क्षण
बदल रहा हूँ। 

अब पहले की तरह
जल्दी से
शेव नहीं करता, 
हफ्ता हफ्ता भर
यूँ ही बढ़ने देता हूँ
दाढ़ी अपनी। 

पहले आईना देखकर 
इत्मीनान से
बाल संवारता था, 
अब नहीं। 
अब आँखें बंद करता हूँ 
और तुम्हारी यादों को
संवारता हूँ। 

देर तक जागना, 
देर तक सोना, 
संडे हो या मंडे
मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। 

न तुम्हारे आने की, 
न तुम्हारे जाने की, 
न तुमसे मिलने की, 
अब किसी बात की
कोई फिक्र नहीं रहती। 

मगर तुम
आज भी वैसी ही हो
जैसे कल थी। 
वैसा ही जैसे तुम्हें
आख़िरी बार देखा था
शाम की दहलीज़ पर
खड़े होकर 
हाथ हिला कर 
मुझे अलविदा कहते हुए।
 

वही दुपट्टा,
वहीं सलवार कमीज, 
वही बिखरी हुई लटो को
बार बार कान के पीछे
ले जाती हुई तुम्हारी तर्जनी, 
और चेहरे पर
पसरी हुई उदासी
सब कुछ याद है मुझे। 

हाँ, सब कुछ वैसा ही है। 
क्योंकि स्मृतियां नहीं बदलती, 
उनकी उम्र नहीं ढलती, 
उनकी आदते, चेहरा
बिल्कुल वैसा ही रहता है
जैसे किसी लम्हे को
कैद कर लिया जाता है
कैमरे से तस्वीरों में, 
और हम देखते है
उम्र के दो पड़ाव एक साथ
एक बदलता हुआ
तो दूसरा 
समय को मात देता हुआ स्थिर। 

आज और बीते हुए
कल के संगम का
जरिया... मात्र ये
स्मृतियाँ ही तो है
जिन्हें हम संजोए रखते है
हमेशा हमेशा के लिये खुद में। 

नीरज आहुजा 
स्वरचित, सर्वाधिकार सुरक्षित