सोमवार, 22 जून 2020

स्वप्न लोक- एक हास्य कविता ( swapn lok ek hasya kavita)

स्वप्न लोक में जलघर
जलघर में जलपरी
जलपरी गोते लगाए
देखे बिना रहा न जाए

परी थी बहुत सुंदर
उछला मन का बंदर 
जीते जी अनुभव हुआ
स्वर्ग सदृश हम पाएं

मन में हुआ आभास
जाकर देखूँ पास
सत्य है, या है मिथ्या
कैसे पता लगाएं

कूद गए थे जल में
बिन सोचे ही पल में
झट से खूल गई नींद
गिरे पलंग से धांय

हड्डी न कोई टूटी
लेकिन किस्मत फूटी
स्वप्नलोक की परी को
हम छू भी ना पाएं

रविवार, 21 जून 2020

लिखे थे खत तुझे- likhe the khat tujhe

लिखे थे खत तुझे
चरागों तले
अंधेरी रातों में
सोचकर तुझको
कि तुम आ जाओ जो
अचानक से
सामने मेरे
तो मैं क्या कहूँगा। 
क्या मैं सकपका जाऊंगा 
या बोल दूंगा
दिल की सारी बातें
बेधड़क तुमको 
जो भी मैं सोचता हूँ
तुम्हारे बारें में
तन्हाई में बैठकर। 

क्या तुम भी सोचती हो
मेरे बारे में
इस तरह ही
या
मैं ही दीवाना हूँ
आशिक़ हूँ वगैहर वगैहर
जो भी होते है नाम
पागल प्रेमियों के। 

क्या तुम भी हो जाती हो
पागल, दिवानी
और लिखती हो
खत मुझे
इसी तरह ही
अंधेरी रातों में
तन्हाई में बैठकर 
सोचकर मुझको।

~नीरज आहुजा
स्वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 19 जून 2020

हार को जीत में बदलना है- haar ko jeet me badalna hai

कुंदन  बनना  है, जलना है
हार को जीत में बदलना है

हाथ पर  हाथ  धरे क्यों  बैठे
हम मुश्किल से डरे क्यों बैठे
पथ पर जो अवरोध बिछे हो
उनको पाँव तले  कुचलना है

हो जिजीविषा विश्वास अटल
धैर्य बुद्धि में, हो बाहों में बल
विफलता दामन पकड़े अगर
झटक कर  हाथ  निकलना है

हो दूर  भले  तट  जितना  भी
रख धैर्य मन में, बल उतना ही
मझधार ही जीवन  लक्ष्य नहीं
माझी को भंवर से निकलना है

~नीरज आहुजा
सर्वाधिकार सुरक्षित 

गुरुवार, 18 जून 2020

भूली बिसरी गलियाँ- bhooli bisri galiyan

वो भूली बिसरी गलियाँ पुरानी
कहाँ छोड़ आए है हम वो कहानी
वो गुजरा हुआ बचपन याद करलें
ढलती हुई भूलकर हम जवानी 

तपती हुई धूप में तर बदन हो
मन ये मगर खेलने मे मगन हो
बुलाते परिंदों को घोंसले थे
मगर बात हमने कहाँ थी मानी

लथपथ पसीने में हम झूमते थे
भरी दोपहर गलियां घूमते थे
गले सूखते थे दोस्तों के ही घर पे
घर अपने कब हम पीते थे पानी

झूलों से गिर के हंसने थे लगते
कपड़े हों गंदे तो चेहरे थे जगते
किसको बताएं अपनी गुजरिया 
पेड़ों पे लटकी कहाँ है निशानी

~नीरज आहुजा

मंगलवार, 16 जून 2020

तुम और तुम्हारी चाय-Tum our tumhari chai

कविता- तुम और तुम्हारी चाय

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मैं चाय नहीं पीता था
तुम्हें पीते हुए देखा
तो लत लग गई
चाय की/तुम्हारी
अचानक तुम कब
चाय पीते पीते
काॅफ़ी पीने लगे
पता ही नहीं चला
और मैं आज भी
चाय के लिए
तरसता रहता हूँ
तुम बनाते थे
तो मैं पीता था
तुम्हें मालूम था न?
मुझे चाय बनानी नहीं आती।

तुम्हारे वाला किस्सा फिर कभी...

~नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
सर्वाधिकार सुरक्षित