मंगलवार, 23 जून 2020

कुण्डलिया छंद - kundaliya chhand

कुण्डलिया छंद

1. विषय : मिट्टी के रंग

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ढल जाती हर रूप में, चाहे जिसमें ढाल
मिट्टी   के हैं रंग बहु, अम्बर से पाताल
अम्बर से पाताल, स्वरूप इसके निराले
अंग रंग,व्यवहार, बदल आकृति को डाले
'नीर' कहे संतोष और है मिट्टी में बल
जैसा हो परिवेश , जाती उसमें स्वयं ढल 
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2

विषय : चुप रहकर

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रहकर चुप है रह गई, भारी मन पर टीस
कह देते तो टूटते, पूरे ही बत्तीस
पूरे ही बत्तीस, लगवाते नया जबड़ा
लेता हूँ ना मौल, इसलिए उससे झगड़ा
सौच समझ कर नीर, भावना में ना बहकर
रखना दिल की बात, शिष्टता में ही रहकर
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3

विषय: समय बड़ा बलवान

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करता सबका फैंसला, समय बड़ा बलवान
जिस पल भूले हम इसे, देता तिस पल ज्ञान
देता तिस पल ज्ञान, लेकिन पड़े पछताना 
मुँह से निकले राम, रोना और कुरलाना
नीरज करता भूल, नहीं क्यूँ फिर भी डरता
समय न देता छोड़, न्याय ये सबका करता
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4

विषय: मुम्बई मैट्रो विरोध

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'आरे' की जमीन पर, कर रहे घमासान 
मत काटो तुम पेड़ को, 'मरता मर इंसान' 
मरता मर इंसान, सड़क दुर्घटनाओं में
पर मैटरो विरोध, करेंगे चौराहों में
समझ रहे सब लोग, चर्च फिरे मारे मारे
चाहता है जमीन, हड़पना जंगल 'आरे' 
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5

विषय: सम्बंध विच्छेद

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अब जरूरी हो गया, है तुमसे विच्छेद
जब से है यह तय हुआ, मन दोनो में भेद
मन दोनों में भेद, करेंगे खूब लड़ाई
देगा फिर चहुँओर, तू-तू मैं-मैं सुनाई 
'नीर' करे अनुरोध, सही बात जान लें सब 
निकला यह निष्कर्ष, हो जाएं अलग हम अब
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6
विषय: खटपट
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कोई तुमसे सीख ले, रिश्ते देना तोड़ 
कैसे देते हाथ को, बीच राह में छोड़
बीच राह में छोड़, यूँ भागते तुम सरपट
हो गए परेशान, हुई जो थोड़ी खटपट
'नीर' जिसे दे भाव, दगा दे जाता सोई
किस पर करूं यक़ीन, साथ ना देता कोई 
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7

 विषय: पी. के. डी. मिशन

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पी के डी है क्या बला, रात दिन यही सोच
सोच सोच कर आ गयी, है दिमाग में मोच
है दिमाग में मोच,अंशुल भईया बतला
नोच नोच कर बाल, हो न जाऊं मैं टकला 
पगलाने को 'नीर' , होने लगा है रेडी 
जल्दी से दो बोल, क्या है मिशन पी के डी
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8

विषय: करवा चौथ का बदल

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भरपाई करने लगी, "बदला करवा पूज"
करवे के दिन थी मधूर, आज बदल गई कूज
आज बदल गई कूज, फेंकती मुख से शोले
ले बदले की आग, न जाने क्या-क्या बोले
कहती जितनी सांस, इस बंदर की बढ़ाई
पंखे खिड़की साफ, हो कराकर भरपाई
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9

विषय : तोता-मैना

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तोता मैना पर नज़र, रखता है दिन रात
दूर-दूर से देखता, पर करता ना बात
पर करता ना बात, क्योंकि हुई थी लड़ाई
तोते को जब बोल, गई थी मैना भाई
कहे 'नीर' हर बार, यूँ ही तो नहीं होता
मैना हो जिस डाल, उसी पर बैठे तोता 
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10

विषय: चीत्कार

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रहते जितना पास तुम, उतना बढ़ता प्यार
हो जाते हो दूर जब, मन करता चीत्कार
मन करता चीत्कार, नाम लेकर के तेरा
बिन तेरे सब सून, लगता जी नहीं मेरा
रहा 'नीर' ये सोच, क्यूँ तुम कुछ नहीं कहते
अब तो दो कुछ बोल, चुप इतना नहीं रहते
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11

विषय: सच नहीं लिखते

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लिखते क्यूँ ना बात वो, जिसमें कि हो निचोड़ 
बचा-खुचा ही लिख रहे, सभी पुलिंदा छोड़
सभी पुलिंदा छोड़, झूठ बाकी का बोलें
करने लगें कुर्तक, नहीं तराजू पर तोलें
छोड़ विषय अब मूल, बेकार बातें करते
सच पर परदा डाल, जो मन कहे सो लिखते 
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12

विषय: राम मंदिर

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आएंगे वनवास से, लोटेंगे श्री राम
निश्चित तो यह हो चुका, बन जाएगा धाम 
बन जाएगा धाम, तारीख अब तुम पूछो
करते रहे विरोध, षड्यंत्र नया कोई बूझो
करलो जितना शोर, मंदिर हम बनाएंगे 
हर मुख होंगे बोल, राम लल्ला आएंगे
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13

विषय: व्यर्थ समय गवाना

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बीते साल न कुछ किया, सोचा किया विचार
लेकिन समझ नहीं पड़ा, कैसे दिया गुजार
कैसे दिया गुजार, सोच कर ये पछताया
किया न अर्जित ज्ञान, और न धेला कमाया
'नीर' करो कुछ काम, व्यर्थ जीवन क्यूँ जीते
समय हाथ की रेत, हाथ से फिसले, बीते
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14

विषय : मंगलमय नववर्ष हो

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मंगलमय नववर्ष हो, हो ना उन्नीस बीस
इच्छा पूरी हो सभी, दो भगवान असीस
दो भगवान असीस, रहमत सभी पर बरसे
रहे कोई न दीन, धन दौलत को न तरसे
आपस में सब 'नीर', रहें प्रेम से बिना भय
सब मे हो सद्भाव, नववर्ष हो मंगलमय 
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15

विषय: रोटी-पानी 

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रोटी भूखे को मिले, पानी जिसको प्यास
तन कपड़े से हो ढका, रहने को आवास
रहने को आवास, मिले सभी को जरूरी
रहे कोई न दीन, मांग हो सबकी पूरी
हिम्मत रखना 'नीर', कहो ना किस्मत खोटी 
देता पालनहार, सभी जीवों को रोटी
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16

विषय: गोपी-गोप

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बनकर बैठे पेड़ के, नीचे गोपी गोप
एक पंथ दो काज कर, बूटा भी दो रोप
बूटा भी दो रोप, साथ लो खुरपी पानी
उनको भी हो लाभ, पीढ़ी जो अभी आनी
'नीरज' ऐसी प्रीत, सब ही करेंगे जमकर
जो आए त्योहार, पर्यावरण का बनकर
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17

विषय: धोखेबाज 

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पकड़े बैठी बाग में, वो दूजे का हाथ
किरचा किरचा मन हुआ, देख किसी के साथ
देख किसी के साथ, माथा दिया ठनकाया
कैसी धोखेबाज, से मैंने दिल लगाया
'नीरज' तुझसे बात, करते बहुत थी अकड़े
आज हुआ मालूम, गये दोनो जब पकड़े
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18

विषय: कोरोना

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हावी पल मे हो पडे़, हुई जरा जो चूक
सावधान रहना सभी, सुनो बात दो टूक
सुनो बात दो टूक, कोरोना है भयंकर
खड़ा हुआ ये देख, सामने सीना तनकर
सुनो सखा तुम 'नीर', उठाओ कदम प्रभावी
इसका नहीं इलाज, अगर हो जाए हावी
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नीरज आहुजा 
स्वरचित रचना 
सर्वाधिकार सुरक्षित 

सोमवार, 22 जून 2020

स्वप्न लोक- एक हास्य कविता ( swapn lok ek hasya kavita)

स्वप्न लोक में जलघर
जलघर में जलपरी
जलपरी गोते लगाए
देखे बिना रहा न जाए

परी थी बहुत सुंदर
उछला मन का बंदर 
जीते जी अनुभव हुआ
स्वर्ग सदृश हम पाएं

मन में हुआ आभास
जाकर देखूँ पास
सत्य है, या है मिथ्या
कैसे पता लगाएं

कूद गए थे जल में
बिन सोचे ही पल में
झट से खूल गई नींद
गिरे पलंग से धांय

हड्डी न कोई टूटी
लेकिन किस्मत फूटी
स्वप्नलोक की परी को
हम छू भी ना पाएं

रविवार, 21 जून 2020

लिखे थे खत तुझे- likhe the khat tujhe

लिखे थे खत तुझे
चरागों तले
अंधेरी रातों में
सोचकर तुझको
कि तुम आ जाओ जो
अचानक से
सामने मेरे
तो मैं क्या कहूँगा। 
क्या मैं सकपका जाऊंगा 
या बोल दूंगा
दिल की सारी बातें
बेधड़क तुमको 
जो भी मैं सोचता हूँ
तुम्हारे बारें में
तन्हाई में बैठकर। 

क्या तुम भी सोचती हो
मेरे बारे में
इस तरह ही
या
मैं ही दीवाना हूँ
आशिक़ हूँ वगैहर वगैहर
जो भी होते है नाम
पागल प्रेमियों के। 

क्या तुम भी हो जाती हो
पागल, दिवानी
और लिखती हो
खत मुझे
इसी तरह ही
अंधेरी रातों में
तन्हाई में बैठकर 
सोचकर मुझको।

~नीरज आहुजा
स्वरचित रचना, सर्वाधिकार सुरक्षित 

शुक्रवार, 19 जून 2020

हार को जीत में बदलना है- haar ko jeet me badalna hai

कुंदन  बनना  है, जलना है
हार को जीत में बदलना है

हाथ पर  हाथ  धरे क्यों  बैठे
हम मुश्किल से डरे क्यों बैठे
पथ पर जो अवरोध बिछे हो
उनको पाँव तले  कुचलना है

हो जिजीविषा विश्वास अटल
धैर्य बुद्धि में, हो बाहों में बल
विफलता दामन पकड़े अगर
झटक कर  हाथ  निकलना है

हो दूर  भले  तट  जितना  भी
रख धैर्य मन में, बल उतना ही
मझधार ही जीवन  लक्ष्य नहीं
माझी को भंवर से निकलना है

~नीरज आहुजा
सर्वाधिकार सुरक्षित 

गुरुवार, 18 जून 2020

भूली बिसरी गलियाँ- bhooli bisri galiyan

वो भूली बिसरी गलियाँ पुरानी
कहाँ छोड़ आए है हम वो कहानी
वो गुजरा हुआ बचपन याद करलें
ढलती हुई भूलकर हम जवानी 

तपती हुई धूप में तर बदन हो
मन ये मगर खेलने मे मगन हो
बुलाते परिंदों को घोंसले थे
मगर बात हमने कहाँ थी मानी

लथपथ पसीने में हम झूमते थे
भरी दोपहर गलियां घूमते थे
गले सूखते थे दोस्तों के ही घर पे
घर अपने कब हम पीते थे पानी

झूलों से गिर के हंसने थे लगते
कपड़े हों गंदे तो चेहरे थे जगते
किसको बताएं अपनी गुजरिया 
पेड़ों पे लटकी कहाँ है निशानी

~नीरज आहुजा