गुरुवार, 27 अगस्त 2020

मुक्तक : कोरोना का डर - Corona Ka Dar

 कोरोना के डर से

Neeraj kavitavali

बह्र- 1222/1222/1222/1222
मिलाना  हाथ  को  छोड़ा, करें  सब  दूर  से   बातें।
ज़रूरी  ना  अगर  हो   तो   नहीं  करते  मुलाक़ातें।
कि  कोरोना से  डर से तो कोई आता  नहीं घर पर
लगा जमघट नहीं सकते, निकल सकती ना बारातें।
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नीरज आहुजा 


बुधवार, 26 अगस्त 2020

मुक्तक : जीवन का अफ़साना लिख - Jeevan ka afsana likh

         मुक्तक : जीवन का अफ़साना लिख


Neeraj kavitavali

दुनिया है यह जलती शम्मा, खुद को इक परवाना लिख
चाहत  में   मरजाता   कैसे,  है  आतुर   दीवाना   लिख
बाद  मगर  मरजाने  के  तब,  याद  करेगी  यह  दुनिया
संघर्षों  में   कैसे   बीता,  जीवन   का  अफ़साना  लिख
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नीरज आहुजा 

मंगलवार, 25 अगस्त 2020

ग़ज़ल: प्यार के क़ाबिल नहीं - pyar ke kabil nhi

ग़ज़ल

बह्र- 2122/2122/212

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दोस्ती गर प्यार के क़ाबिल नहीं 

यार भी फिर यार के क़ाबिल नहीं

Neeraj kavitavali

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बिक गया जो खुद किसी अहसान में

फिर कहीं ख़रिदार के क़ाबिल नहीं

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पास वो ही तो नहीं आता मिरे

जो कि इस ख़ुद्दार के क़ाबिल नहीं

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डूब जाती हैं समंदर बीच जो

कश्तिया़ँ मझदार के क़ाबिल नहीं

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गर कहीं फैला सके ना सनसनी

क्या ख़बर अख़बार के क़ाबिल नहीं 

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बात बिन ही जो लगा इल्जाम दें

फूल होते खार के क़ाबिल दें

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आँख से ही पी लिया जिसने बदन

वो नज़र दीदार के क़ाबिल नहीं 

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जानते तो हैं सभी पर मौन है

ज़िन्दगी की मार के क़ाबिल नहीं 

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तोड़ दें जिस आदमी को मुश्किलें 

जिंदगी की मार के क़ाबिल नहीं

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है दवा तू ही तो इस दिल की सनम

बाकी सब बीमार के क़ाबिल नहीं

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नीरज आहुजा 

सोमवार, 24 अगस्त 2020

मुक्तक : पलटकर देख लेते तुम- palatkar dekh lete tum

 पलटकर देख लेते तुम

Neeraj kavitavali

रहा  पहले  न  जैसा  अब, बदल  सारा  गया  मौसम
खुशी रहती नहीं रुख पर, छलकती  आँख  है  हरदम
गये  हो  देस  किस तुम, छोड़  कर  हमको, बता  देते
हुआ है  हाल  क्या  पीछे,  पलट  कर  देख  लेते  तुम
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नीरज आहुजा 

रविवार, 23 अगस्त 2020

कोरोना से घबराते - corona se ghabrate


कोरोना से घबराते 

Neeraj kavitavali

सत्ता के गलियारों से हर, यह आवाजें निकल रही, 

घर पर बैठो, बाहर सबको, बीमारी है निगल रही।

अर्थव्यवस्था और  चिकित्सा, में उन्नत  माने जाते, 

देश आज  लाचार   हुए   वो, कोरोना से घबराते।

भारत में जो फैल गया, ना  रोग  सँभाला जाएगा, 

किया अगर सहयोग न हमने, हाहाकार मचाए गा।

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नीरज आहुजा 

स्वरचित 

शनिवार, 22 अगस्त 2020

ग़ज़ल: हँस हँसाकर चलो - has hsakar chalo


ग़ज़ल 
बह्र-122/122/122/12
खुशी  के  लम्हे   को  चुरा  कर  चलो
जियो   जिंदगी   हँस   हँसाकर  चलो

अगर  सोचते  हो   कि  फुरसत  मिले
नहीं   फिर   मिलेगी  लगाकर   चलो 

Neeraj kavitavali


न  कल  का पता है न पल की खबर
खुदा फिर क्यूँ खुद को बनाकर चलो

नहीं  साथ  कुछ  भी  किसी के गया 
मिला  जो  यहाँ  सब  लुटाकर  चलो

गया   दूर   जो  भी   उसे   लो  बुला 
हुआ   फासला  तो   मिटाकर  चलो

कमी   देखने   की   है   आदत  बुरी
रहो   दूर  खुद   को   बचाकर  चलो 

उड़ो   आसमां    में  कहीं भी  मगर 
जमीं  को   जमीं  तो  बनाकर  चलो
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नीरज आहुजा