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सोमवार, 6 जुलाई 2020
रात की बहती नदी - raat ki bahati ndi
दूरियाँ जब से बढ़ी है, चाँद तारे देखते
रात की बहती नदी के बन किनारे देखते
याद ही बाकी बची जिसके सहारे जी रहे
साथ में मिलकर हसीं जो दिन गुजारे देखते
बह्र- 2122-2122-2122-212
तुम्हें देखा नहीं जब से - tumhe dekha nhi jab se
तुम्हें देखा नहीं जब से, तुम्हारी याद आती है
यही इक चीज जो दिल में तुम्हारे बाद आती है
भले तुम रोक लो कितना, तुम्हारा बस नहीं चलता
तुम्हारी कैद से होकर मगर आजाद आती है
बह्र - 1222 1222 1222 1222
रविवार, 5 जुलाई 2020
शायद यही मंजूर था- shayad yahi manzoor tha
बह्र : 2212 2212 2212 2212
धर हाथ तब बैठा रहा, जब तक कि दुश्मन दूर था
जब आ गले आफत गई, कहने लगा मजबूर था
भूं डाल कर हथियार को, हो कर्महीन लड़ता नहीं
फिर मान ले, भगवान को शायद यही मंज़ूर था
शनिवार, 4 जुलाई 2020
प्यार की ताक़त - pyar ki takat
बह्र: 2122 2122 2122 212
सर झुका छोटा नहीं होता कभी, जो मीत हो
प्यार वो ताक़त कि जिसमें हार कर भी जीत हो
दुश्मनी टिकती नहीं है सामने इसके कभी
चाहतों को दे जगा, कितना भले विपरीत हो
शुक्रवार, 3 जुलाई 2020
कर्म का प्रतिफल
जीवन में कब, कहाँ,
कुछ भी
होता है
बिना प्रतिफल के।।
जो बोया वही काटा।
जो किया अर्पण
वही है आता
पलटकर चल के।।
कुछ भी नहीं जाता व्यर्थ
जो भी किया,
सोचा, समझा
या कहा गया
होती है सब की
एक प्रतिध्वनि
प्रेम, कुंठा, सम्मान
और छल भी
मिलता है बदले छल के।।
गुरुवार, 2 जुलाई 2020
साथ सभी के यारी रख
हिम्मत रख, खुद्दारी रख
कभी न तू लाचारी रख।
कर्म निरंतर करता जा
थक कर ना बेकारी रख।
आएं जो अवरोध कभी
दोनों हाथ कटारी रख।
गिरना, उठना, चलना है
मन को न कभी भारी रख।
हार मान कर बैठ नहीं
सफर हमेशा जारी रख।
हँसना सीख, हँसाना भी
साथ सभी के यारी रख।
~नीरज आहुजा
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