मुक्तक : देख कर दुनिया तुम्हारी
देख कर दुनिया तुम्हारी, थर थराती ज़िन्दगी
चोर आते लूटते, अस्मत बचाती ज़िन्दगी
बंद दरवाज़ा किया है, डर बना दरबान है
झांकती बस खिड़कियों से, जी न पाती ज़िन्दगी
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नीरज आहुजा
देख कर दुनिया तुम्हारी, थर थराती ज़िन्दगी
चोर आते लूटते, अस्मत बचाती ज़िन्दगी
बंद दरवाज़ा किया है, डर बना दरबान है
झांकती बस खिड़कियों से, जी न पाती ज़िन्दगी
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नीरज आहुजा
बह्र-1222 1222 1222 1222
ज़मीं छत और दीवारें, वज़न लगता नहीं भारा
अकेला आदमी घर का, उठाता बोझ है सारा
बदलती रुत भले जितनी, नहीं थकते कदम इसके
किसी दर पर नहीं अटका, लगा हिम्मत का है नारा
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नीरज आहुजा
राहें मंज़िल भूल रही हैं, फूलों ने सौरभ छोड़ा
नदियों ने इतराकर अपना, सागर से रस्ता मोड़ा
वात नहीं रहती पेडों पर, पंछी नभ से ओझल हैं
सांस कहेगी किस दिन यह तन, मोचन में बनता रोड़ा
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नीरज आहुजा
बह्र - 2122 2122 2122 212
बह्र- 2122 1212 22
याद में नग़्मगी नहीं होती
आँख मेरी भरी नहीं होती
तुम अगर ना मुझे मिले होते
मुझसे यूँ शायरी नहीं होती
हसरतें टूट कर बिखरती हैं
अब यहाँ ज़िन्दगी नहीं होती
चाँद बनकर न दिल धड़कना तुम
दिल में जब चाँदनी नहीं होती
दिल कहीं और मैं कहीं खोया
इस तरह बेखुदी नहीं होती
मैं कदम से मिला कदम चलता
तुम अगर सोचती नहीं होती
जब से हो छोड़ कर गये मुझको
मुझसे फिर दिल्लगी नहीं होती
बात कुछ तो अलग लगी तुम में
वर्ना तुम आखिरी नहीं होती
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नीरज आहुजा
जिस थाली में ज़हर दिया है, उस थाली में छेद करो।
कलाकार हैं या पाखंडी, दोनों में अब भेद करो।
जनता ने विश्वास किया तो, तुमको नायक कह डाला।
लेकिन सर चढ़ बैठ गये तुम, जैसे चढ़ती है हाला।
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नीरज आहुजा