चाँद मक्कारी करता है





जैसा चाहा वैसा जीवन, जब यह ना बन पाता है
उम्मीदें पर पानी फिरता, दुख से जुड़ता नाता है
ले लेते अवसाद जनम फिर चिंता में डूबे रहते
क्या पाया क्या खोया में ही, समय गुजरता जाता है
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नीरज आहुजा


ग़ज़ल
बह्र- 2122/2122/212
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दोस्ती गर प्यार के क़ाबिल नहीं
यार भी फिर यार के क़ाबिल नहीं

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बिक गया जो खुद किसी अहसान में
फिर कहीं ख़रिदार के क़ाबिल नहीं
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पास वो ही तो नहीं आता मिरे
जो कि इस ख़ुद्दार के क़ाबिल नहीं
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डूब जाती हैं समंदर बीच जो
कश्तिया़ँ मझदार के क़ाबिल नहीं
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गर कहीं फैला सके ना सनसनी
क्या ख़बर अख़बार के क़ाबिल नहीं
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बात बिन ही जो लगा इल्जाम दें
फूल होते खार के क़ाबिल दें
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आँख से ही पी लिया जिसने बदन
वो नज़र दीदार के क़ाबिल नहीं
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जानते तो हैं सभी पर मौन है
ज़िन्दगी की मार के क़ाबिल नहीं
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तोड़ दें जिस आदमी को मुश्किलें
जिंदगी की मार के क़ाबिल नहीं
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है दवा तू ही तो इस दिल की सनम
बाकी सब बीमार के क़ाबिल नहीं
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नीरज आहुजा

सत्ता के गलियारों से हर, यह आवाजें निकल रही,
घर पर बैठो, बाहर सबको, बीमारी है निगल रही।
अर्थव्यवस्था और चिकित्सा, में उन्नत माने जाते,
देश आज लाचार हुए वो, कोरोना से घबराते।
भारत में जो फैल गया, ना रोग सँभाला जाएगा,
किया अगर सहयोग न हमने, हाहाकार मचाए गा।
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नीरज आहुजा
स्वरचित
ज़िन्दगी की reel में
कोई cut paste की
option नहीं होती।
सब कुछ निरंतर
play होता रहता है।
किसी director को
action और cut कहने की भी
जरूरत नहीं पड़ती।
संवाद भी लिखित नहीं होते।
और retake भी नहीं लिया जाता।
हर shot को perfect
shot मान लिया जाता है।
किरदार भी acting नहीं करते
बल्कि उन्हें जीना पड़ता है
हर परिस्थिति को
अपनी सूझ बूझ और
क्षमता अनुसार।
जिन्दगी की रील
किसी 70 mm के परदे पर
release नहीं होती।
बल्कि ये तो
किसी theater पर चल रहे
drama की तरह
चलती है live.
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नीरज आहुजा
स्वरचित
मानो मेरी अब
दस्तक देते हाथ थकेबोल बोल कर लबखोलो दिल का दरवाज़ामानो मेरी अबरोज तुम्हारी राहों मेंलेकर अपना दिल आतागीत प्रेम के लिखता थागीत प्रेम के हूँ गाताकब तलक सताओगेमीत बनोगे मेरे कबखोलो दिल का दरवाज़ामानो मेरी अबचंदा मेरा यार बन गयातारों से हो गई दोस्तीतुम होती तो अच्छा होतामिलकर करते मस्तीचाँद सितारे शबनमकरते सिफारिश सबखोलो दिल का दरवाज़ामानो मेरी अबसमय गवाना,पछतानामानोगे नहीं बातमैं देता हूँ प्रेम प्रस्तावतुम देते आघातजानोगे क्या प्रीत मेरीमर जाऊंगा तबखोलो दिल का दरवाज़ामानो मेरी अबपल पल करके कितने हीगुजर गए दिन सालकभी तो मुझसे पूछा होतातुमने मेरा हालबुलबुला नहीं पानी काजो जाता पल में दबखोलो दिल का दरवाज़ामानो मेरी अब
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नीरज आहुजा
स्वरचित
"सब अच्छा हो जाएगा"
बदलती है रुत,
मौसम और समय भी।
एकरस इस संसार में
क्या रह पाएगा।।
जो आज है कल नहीं।
जो कल होगा वो परसो नहीं।
वक्त का पहिया घुमेगा और
सब कुछ बीता जाएगा।।
यही धारणा लिए मन मे
पड़ता है जीना
भले हो दु:ख कितने भी
हार नहीं मान सकते
रखनी पड़ती है आशा
अच्छा होने की
और कहना पड़ता है
सब अच्छा हो जाएगा ।।
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नीरज आहुजा
स्वरचित
"छुपते फिरते हैं"
छुपते फिर रहे हैं
अपनी सोच से
द्वंद से, विचारों से।
भाग जाना चाहते है
खुद से कहीं दूर,
किसी वीरान जगह पर
जहाँ देख न पाएं
ढूंढ न पाएं खुद को।
आँखें बंद कर लेना चाहते है
और दबा देना चाहते है
मन में कौंधते हुए
सवालों को
अंतर्द्वंद को
जैसे दबा दी जाती हैं
बहुत सी खबरें अक्सर
सनसनी फैलने के डर से
शहर को बचाने के लिए।
बस इसी तरह
मस्तिष्क को भय और
आतंक के माहौल से
बचाने का एक तरीक़ा
यह भी है कि
होने दिया जाए
जो हो रहा
और उसे ही
अपनी नियती मानकर
ऐसे रहें जैसे कि कुछ
हुआ ही ना हो।
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नीरज आहुजा
स्वरचित
"थोड़ी सी हँसी"
थोड़ी सी हँसी
बचाकर रखना
मेरे लिए
ताकी जब मैं तुमसे मिलूँ
तो तुम्हारे चेहरे पर
मेरे नाम की
एक हल्की सी
मुस्कान सजी हो।
अच्छा लगेगा मुझे
गर तुम ऐसा कर सको।
वैसे कोई उम्मीद नहीं
तुमसे कुछ पाने की
मगर फिर भी
पता नहीं क्यूँ
ख्वाहिश कर बैठता हूँ
जब भी देखता हूँ तुम्हें।
शायद सिर्फ इसलिए
कि मुझे तुमसे
बाते करना
तुम्हारे साथ वक्त बिताना और
तुम्हें यूँ ही कईं घंटो तक
टकटकी लगाकार देखना
अच्छा लगता है।
क्या तुमको भी
अच्छा लगता है
मुझसे बाते करना,
तुम्हारा नाम लेने भर से
मेरे चेहरे पर आने वाली
हल्की सी मुस्कान देखना?
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
कौन सच्चा हससफ़र है बात बिन मतलब करे
साथ देने को किसी का हाथ बिन मतलब करे
"चलते चलते राह में"
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चलते चलते राह में
मिल जाते है जब हमें
अपने पुराने
खोए हुए पासवर्ड
तो धड़क उठता दिल
देखकर उनको
आता है तुफान
उफनती है लहरे
और टकराकर साहिल से
कह देना चाहती है
सब कुछ अपने दिल की
मगर रोक लेते हैं खुद को
गोद में उनकी
एक बरस के छोटे से
किसी और आई डी से
जनरेट हुए
ओ टी पी देखकर।
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नीरज आहुजा
स्वरचित
तुम अगर यूँ ख़फ़ा नहीं होती
जिंदगी ये जफ़ा नहीं होती
आइना देखकर मुकर जाऊं
अक्स में जिस दफ़ा नहीं होती
"दो घड़ी के लिए"
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मुक्तक
ज़िन्दगी जल रही और उठता धुआँ
दो घड़ी के लिए भी सुकूँ है कहाँ
चैन से जी रहा सो रहा कौन है
दर्द ही दर्द है, देखते हम जहाँ
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
"चाँद को देखा करो"
बह्र- 2122/2122-2122-212
मुक्तक
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चाँद को देखा करो, महताब में ही खुश रहो
है हक़ीक़त कुछ नहीं बस ख़्वाब में ही खुश रहो
गर नहीं देती खुशी के पल कभी जो ज़िन्दगी
आँख से बहते रहें जो, आब में ही खुश रहो
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नीरज आहुजा
स्वरचित रचना
"चाँद नगर में रहने वाले"
मुक्तक
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चाँद नगर में रहनेवाले, ख़्वाब सितारों के बुनते
कर विश्वास उसी पर लेते, लोगों से जैसा सुनते
ढोल दूर के लगे सुहाने, देख हक़ीक़त डर जाएं
फूल छोड़ देते जीवन में, बाकी के कांटे चुनते
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नीरज आहुजा
स्वरचित